जब नीतियां केवल कागजों पर नहीं बनतीं बल्कि जमीन की वास्तविक नब्ज को समझकर गढ़ी जाती हैं, तो देश के सबसे पिछड़े और आकांक्षी जिले भी विकास की एक नई इबारत लिख देते हैं। देश की राजधानी नई दिल्ली स्थित प्रतिष्ठित पूसा परिसर के भारत रत्न सी. सुब्रह्मण्यम सभागार में आयोजित ‘प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना’ (PMDDKY) के पहले राष्ट्रीय सम्मेलन में कुछ ऐसा ही स्पष्ट संदेश देखने को मिला। इस भव्य आयोजन में देशभर से जुटे 50 से अधिक जिलों के जिलाधिकारियों (कलेक्टर्स), कृषि वैज्ञानिकों और वरिष्ठ नीति-निर्माताओं ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब सरकार के अलग-अलग विभाग एक दिशा में मिलकर काम करते हैं, तो भारत का कृषि परिदृश्य पूरी तरह बदल जाता है।
नवरात्र के पावन अवसर पर आयोजित इस सम्मेलन में केंद्रीय मंत्री ने उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले आकांक्षी जिलों के प्रशासनिक अधिकारियों को सम्मानित किया और देश भर के प्रशासनिक तंत्र में नया जोश भरते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सुशासन की यही खूबी है कि योजनाएं दिल्ली के वातानुकूलित दफ्तरों से नहीं, बल्कि जिलों की जमीनी वास्तविकताओं से तैयार होती हैं।
‘योजना दिल्ली से नहीं, जिले से बनती है’—केंद्रीय मंत्री का कलेक्टर्स को मंत्र
अपने संबोधन के दौरान केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रशासनिक अधिकारियों को प्रेरित करते हुए कहा कि धन-धान्य कृषि योजना की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि जिले के अधिकारी कितनी गंभीरता से मैदानी स्तर पर उतरते हैं। उन्होंने देश के सभी कलेक्टर्स को कड़े निर्देश दिए कि वे हर महीने अपनी पूरी टीम के साथ जिले की कृषि कार्ययोजना की नियमित समीक्षा करें। जहाँ भी विकास की गति धीमी है, वहाँ आपसी समन्वय से उसमें तेजी लाई जाए।
केंद्रीय मंत्री ने ‘इंटर-विभागीय कन्वर्जेंस’ यानी विभिन्न विभागों के आपसी तालमेल पर विशेष जोर दिया। उन्होंने समझाया कि केवल कृषि विभाग अकेले दम पर किसानों की आय नहीं बढ़ा सकता। इसके लिए जल शक्ति मंत्रालय के जरिए सिंचाई के पानी का प्रबंध, खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय के माध्यम से उपज की वैल्यू एडिशन और प्रोसेसिंग, सहकारिता मंत्रालय व किसान उत्पादक संगठनों (FPO) की ताकत, तथा पशुपालन, डेयरी, मत्स्य पालन और एमएसएमई कौशल विकास को एक साथ जोड़ना होगा। जब ये सारे विभाग एक रथ के घोड़ों की तरह एक ही दिशा में दौड़ेंगे, तभी ग्रामीण इलाकों में समृद्धि की असली बयार बहेगी।
इसके साथ ही, उन्होंने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR), कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK) और कृषि विश्वविद्यालयों से जुड़े लगभग 16,000 वैज्ञानिकों के शोध को लैब से निकालकर सीधे किसानों के खेतों तक पहुंचाने की वकालत की।
कम उत्पादकता, राइस-फेलो और क्रेडिट फ्लो पर सरकार का विशेष फोकस
प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना के तहत देश के उन 100 जिलों को प्राथमिकता के दायरे में रखा गया है जो अब तक कृषि उत्पादकता, फसल सघनता (Cropping Intensity) और संस्थागत ऋण प्रवाह (Credit Flow) के मामले में पिछड़े रहे हैं। सम्मेलन में इन बिंदुओं पर गहन मंथन किया गया:
- राइस-फेलो और दलहन की खेती: केंद्रीय मंत्री ने कलेक्टर्स को कड़े निर्देश दिए कि धान की कटाई के बाद उत्तर और पूर्वी भारत के खेतों में जो जमीन खाली (Rice Fallow) रह जाती है, उसमें मिशन मोड पर दलहन और तिलहन की खेती को बढ़ावा दिया जाए। इससे न केवल देश में दालों का उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि किसानों की अतिरिक्त आय भी सुनिश्चित होगी।
- किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) का विस्तार: पूर्वी भारत और देश के अन्य पिछड़े जिलों में कृषि ऋण के प्रवाह को तेज करने पर जोर दिया गया। मंत्री ने कहा कि जब तक किसान के हाथ में पर्याप्त और समय पर पूंजी नहीं होगी, तब तक वह उन्नत बीज, आधुनिक खाद और कृषि यंत्रों का पूरा उपयोग नहीं कर पाएगा।
देशभर के इन जिलों की सफलता बनी पूरे भारत के लिए मिसाल
समारोह के सबसे प्रेरणादायी क्षणों में वे प्रस्तुतियां थीं, जिनमें देश के सबसे कठिन समझे जाने वाले भौगोलिक क्षेत्रों के जिलाधिकारियों ने अपनी सफलता की कहानियां साझा कीं। इन सफल मॉडलों ने साबित कर दिया कि सही नेतृत्व और प्रशासनिक इच्छाशक्ति से सब कुछ संभव है:
- गढ़चिरोली (महाराष्ट्र): कभी उग्रवाद और सूखे से जूझने वाले इस जिले ने जल संरक्षण और सूखा प्रबंधन (Drought Resilience) के अनूठे तरीकों से बंजर जमीन को हरा-भरा बनाकर कृषि उत्पादन में नया रिकॉर्ड कायम किया है।
- अल्लूरी सीताराम राजू जिला (आंध्र प्रदेश): रायलसीमा जैसे कम वर्षा वाले और पथरीले क्षेत्र में कम पानी की खपत वाली हाई-वैल्यू हॉर्टिकल्चर (बागवानी) फसलों को बढ़ावा देकर किसानों की आमदनी में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।
- बांका (बिहार): यहाँ के ‘लीलावरण प्राकृतिक खेती भूमि पुनरुद्धार मॉडल’ (Lilawaran Natural Farming Land Revival Model) ने रासायनिक खादों पर किसानों की निर्भरता को पूरी तरह खत्म कर दिया है और क्षेत्र में प्राकृतिक खेती की एक नई अलख जगाई है।
इसके अलावा जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़, छत्तीसगढ़ के कोरबा और पंजाब के फाजिल्का जिलों द्वारा अपनाए गए कृषि नवाचारों की भी केंद्रीय मंत्रियों और सचिवों ने भरपूर सराहना की।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल के संकल्प को गति
अपने संबोधन के आखिर में शिवराज सिंह चौहान ने प्रसिद्ध पंक्तियां साझा करते हुए प्रशासनिक अधिकारियों और नीति-निर्माताओं में नया जोश भर दिया—
“कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों…”
उन्होंने कहा कि जब मनुष्य ठान लेता है, तो धरती से अमृत निचोड़ने और पहाड़ों को मोड़ने जैसे असंभव दिखने वाले काम भी संभव हो जाते हैं।
उन्होंने याद दिलाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के विकास को तीसरे कार्यकाल में तीन गुना गति और ताकत से आगे बढ़ाने का संकल्प लिया है। इस महायज्ञ में कृषि और ग्रामीण विकास तंत्र अपनी पूरी ऊर्जा झोंक रहा है। सम्मेलन में केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर व भागीरथ चौधरी, ग्रामीण विकास राज्य मंत्री डॉ. चंद्रशेखर पेम्मासानी, कृष्ण पाल गुर्जर सहित केंद्र सरकार के तमाम वरिष्ठ सचिव और विभिन्न राज्यों के कृषि उत्पादन आयुक्त व प्रमुख सचिव मौजूद रहे। इस मंथन से यह स्पष्ट हो गया है कि आने वाले दिनों में भारत के ग्रामीण और आकांक्षी जिलों की आर्थिक तस्वीर तेजी से बदलने वाली है, जिससे देश का अन्नदाता और अधिक सशक्त व आत्मनिर्भर बनेगा।




