भारत में मानसून की आहट के साथ ही खरीफ फसलों की बुवाई की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। खरीफ सीजन, जिसमें मुख्य रूप से धान, मक्का और सोयाबीन जैसी फसलें उगाई जाती हैं, भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। इस सीजन की सफलता पूरी तरह से खाद, विशेषकर यूरिया की समय पर उपलब्धता पर टिकी होती है। केंद्र सरकार ने किसानों की इसी चिंता को समझते हुए एक बहुत बड़ा कूटनीतिक और आर्थिक फैसला लिया है। आने वाले सीजन में खाद का संकट न खड़ा हो, इसके लिए भारत ने विदेशों से 25 लाख टन यूरिया आयात करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। यह कदम इसलिए भी जरूरी था क्योंकि वैश्विक स्तर पर यूरिया की कीमतें आसमान छू रही हैं, लेकिन सरकार का संकल्प है कि इसका बोझ किसानों के कंधों पर न पड़े।
कीमतों का गणित: 84% की भारी बढ़ोतरी
पिछले कुछ महीनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमतों ने सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। आंकड़ों पर गौर करें तो यूरिया के दाम में लगभग 84 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है। इसके पीछे वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे माल (नेचुरल गैस) की बढ़ती कीमतें मुख्य कारण मानी जा रही हैं।
- सरकारी खजाने पर बोझ: जहाँ कुछ समय पहले तक यूरिया काफी कम कीमत पर उपलब्ध था, वहीं अब इसके आयात पर सरकार को भारी-भरकम राशि खर्च करनी पड़ रही है।
- सब्सिडी का सहारा: सरकार इस बढ़ी हुई कीमत का भुगतान खुद करेगी ताकि किसानों को यूरिया उसी पुराने किफायती दाम पर मिलता रहे।
आपूर्ति का रोडमैप: कहाँ-कहाँ से आएगा यूरिया?
भारत सरकार ने उन देशों के साथ संपर्क साधा है जो यूरिया के प्रमुख उत्पादक हैं और जहाँ से सुरक्षित तरीके से माल भारत पहुँच सकता है।
- प्रमुख निर्यातक देश: भारत मुख्य रूप से रूस, मिस्र (Egypt), नाइजीरिया, इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों से यूरिया मंगाने की योजना बना रहा है।
- सुरक्षित रूट: लाल सागर और अन्य समुद्री मार्गों में चल रहे तनाव को देखते हुए, सरकार ने आयात कंपनियों को निर्देश दिए हैं कि वे सुरक्षित बंदरगाहों और विश्वसनीय देशों का चुनाव करें ताकि खाद की खेप रास्ते में न फंसे।
स्टॉक की स्थिति: 4 साल का सबसे निचला स्तर
आयात करने का यह फैसला अचानक नहीं लिया गया है, बल्कि यह गिरते हुए स्टॉक का नतीजा है। 1 अप्रैल 2026 तक के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश में यूरिया का कुल भंडार मात्र 54.22 लाख टन रह गया है।
- चिंता का विषय: यह स्टॉक पिछले साल की तुलना में काफी कम है और पिछले चार वर्षों में सबसे निचले स्तर पर पहुँच गया है।
- जरूरत का आंकलन: खरीफ सीजन में यूरिया की मांग चरम पर होती है। यदि अभी से आयात शुरू नहीं किया गया, तो जून-जुलाई के दौरान मंडियों में खाद के लिए लंबी कतारें लग सकती हैं और कालाबाजारी का खतरा बढ़ सकता है।
धान की खेती पर वैज्ञानिक नजरिया
कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि यूरिया की कमी का सबसे बुरा असर धान (Paddy) की फसल पर पड़ सकता है। धान एक ऐसी फसल है जिसे वानस्पतिक विकास (Vegetative Growth) के लिए भरपूर नाइट्रोजन की आवश्यकता होती है।
- पैदावार में कमी: यदि रोपाई के समय या उसके तुरंत बाद यूरिया की सही खुराक न मिले, तो पौधों की बढ़वार रुक जाती है और अंततः पैदावार में 20 से 30 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है।
- महत्व: भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चावल उत्पादक है, इसलिए धान की फसल की सुरक्षा सीधे तौर पर देश की खाद्य सुरक्षा से जुड़ी है।
सरकार की ‘प्रिवेंटिव स्ट्रैटेजी’ (तैयारी का प्लान)
सरकार ने इस बार ‘वेट एंड वॉच’ के बजाय ‘एक्शन’ की नीति अपनाई है।
- मई-जून का बफर स्टॉक: अप्रैल और मई के महीनों में, जब खेती की गतिविधियां तुलनात्मक रूप से कम होती हैं, सरकार अपने भंडार को भरने की कोशिश कर रही है।
- नैनो यूरिया पर जोर: पारंपरिक यूरिया के साथ-साथ सरकार नैनो यूरिया के इस्तेमाल को भी बढ़ावा दे रही है ताकि विदेशों पर निर्भरता कम की जा सके।
- वितरण प्रणाली: राज्यों को निर्देश दिए गए हैं कि वे जिला स्तर पर उर्वरक केंद्रों की निगरानी बढ़ाएं ताकि खाद का वितरण पारदर्शी हो सके।
‘खबर किसान की’ विशेष टिप्पणी: किसानों के लिए क्या है संदेश?
अंकित भाई, आपके पोर्टल के जरिए किसानों तक यह बात पहुँचनी चाहिए कि सरकार स्थिति पर नजर बनाए हुए है।
- घबराहट में खरीदारी न करें: अक्सर खाद की कमी की अफवाहों के चलते किसान भाई जरूरत से ज्यादा खाद स्टॉक कर लेते हैं। सरकार के इस बड़े आयात के फैसले के बाद स्टॉक की कमी नहीं होगी।
- मिट्टी परीक्षण: यूरिया का उपयोग केवल जरूरत के अनुसार करें। कभी-कभी अधिक यूरिया भी मिट्टी को खराब कर देता है।
जैसे किसी भी निर्माण के लिए मजबूत नींव की जरूरत होती है, वैसे ही एक समृद्ध फसल के लिए खाद का समय पर उपलब्ध होना अनिवार्य है। सरकार द्वारा 25 लाख टन यूरिया आयात करने का फैसला यह सुनिश्चित करता है कि खरीफ 2026 का सीजन किसानों के लिए खुशहाली लेकर आए। अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों के बावजूद, भारतीय कृषि क्षेत्र को खाद संकट से बचाना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता बनी हुई है।




