देश के लाखों गन्ना किसानों के हक की रक्षा और चीनी मिलों में होने वाली गन्ने की नाप-तौल, रिकवरी की हेराफेरी तथा भुगतान विवादों को हमेशा के लिए समाप्त करने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक बहुत बड़ा और निर्णायक कदम उठाया है। नई दिल्ली में आयोजित एक उच्चस्तरीय बैठक के दौरान केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान और केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री प्रह्लाद जोशी ने संयुक्त रूप से ऐलान किया है कि सरकार एक सप्ताह के भीतर एक विशेष उच्चस्तरीय कमेटी का गठन करने जा रही है।
यह संयुक्त कमेटी केंद्र और राज्य सरकारों के प्रतिनिधियों के अलावा स्वयं गन्ना किसानों और देश के शीर्ष कृषि वैज्ञानिकों को एक साथ मंच पर लाएगी। कमेटी का मुख्य उद्देश्य चीनी मिलों में गन्ने की पर्ची, वजन, रिकवरी रेट और समय पर भुगतान से जुड़े तमाम कानूनी व व्यावहारिक विवादों का स्थाई और पारदर्शी समाधान तलाशना होगा, जिससे किसानों को उनके पसीने का पाई-पाई हक मिल सके।
“किसानों की सेवा ही हमारे लिए ईश्वर की पूजा”: केंद्रीय मंत्रियों का कड़ा रुख
कर्नाटक और महाराष्ट्र समेत देश के प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों के किसान प्रतिनिधियों और नेताओं के साथ हुई इस मैराथन बैठक के बाद केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मीडिया को संबोधित करते हुए भावुक और कड़े तेवर दिखाए। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार की प्राथमिकताओं में देश का अन्नदाता सबसे शीर्ष पर है और किसानों की सेवा करना सरकार के लिए किसी मंदिर में भगवान की पूजा करने जैसा पवित्र काम है।
बैठक में किसानों ने चीनी मिलों द्वारा गन्ना रिकवरी रेट कम दिखाने और तौल में गड़बड़ी करने की गंभीर शिकायतें दर्ज कराई थीं। इस पर संज्ञान लेते हुए कृषि मंत्री ने स्पष्ट निर्देश दिए कि गन्ने की तौल और रिकवरी जांचने के लिए एक पारदर्शी और वैज्ञानिक व्यवस्था तुरंत लागू की जाएगी। उन्होंने अधिकारियों को हिदायत दी कि किसी भी स्थिति में किसानों के साथ अन्याय बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और जो भी मिलें नियमों का उल्लंघन करेंगी, उन पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।
एक हफ्ते में बनेगी चार-स्तरीय संयुक्त कमेटी
बैठक में तय हुई रूपरेखा के अनुसार, जो कमेटी बनाई जा रही है उसमें चार प्रमुख हितधारकों को शामिल किया जाएगा। इसमें केंद्र सरकार के संबंधित मंत्रालयों के वरिष्ठ अधिकारी, प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों के प्रशासनिक अधिकारी, गन्ने पर शोध करने वाले प्रमुख कृषि वैज्ञानिक और सबसे महत्वपूर्ण बात कि स्वयं गन्ना किसान प्रतिनिधि शामिल होंगे।
आमतौर पर देखा जाता है कि नीतियां बनाने में किसानों की सीधी भागीदारी नहीं होती, लेकिन इस बार केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि जब तक खेत में हल चलाने वाला किसान खुद अपनी समस्या और समाधान नहीं बताएगा, तब तक व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी नहीं हो सकती। यह कमेटी महज कागजी प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि चीनी मिलों के तकनीकी मॉडल का अध्ययन करके एक स्थायी रिपोर्ट तैयार करेगी, जिसके आधार पर पूरे देश में एक समान और पारदर्शी व्यवस्था लागू की जाएगी।
रिकवरी दर, नाप-तौल और भुगतान विवादों का होगा स्थायी अंत
गन्ना किसानों की सबसे बड़ी पीड़ा यह रही है कि कई चीनी मिलें आधुनिक प्रयोगशालाओं और तकनीकों का हवाला देकर गन्ने का रिकवरी प्रतिशत कम आंकती हैं। रिकवरी दर कम दिखाए जाने से किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य नहीं मिल पाता और उनका भारी आर्थिक नुकसान होता है। इसके अलावा, तौल केंद्रों पर कांटों की गड़बड़ी और मिलों द्वारा गन्ने के बकाये का महीनों तक भुगतान लटकाना भी एक गंभीर मुद्दा रहा है।
प्रस्तावित नई समिति इन्हीं तीनों मुख्य बिंदुओं पर अपनी रिपोर्ट केंद्रित करेगी। वैज्ञानिक पद्धतियों के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाएगा कि गन्ने की रिकवरी का सही और डिजिटल मूल्यांकन हो। तौल व्यवस्था को पूरी तरह से कंप्यूटरीकृत और पारदर्शी बनाया जाएगा ताकि किसान को उसकी ट्रॉली के सटीक वजन की जानकारी तुरंत उसके मोबाइल पर मिल सके। इसके साथ ही, गन्ने का भुगतान तय सीमा के भीतर किसानों के बैंक खातों में डीबीटी के माध्यम से पहुंचाने के लिए सख्त नियम तय किए जाएंगे।
कर्नाटक और महाराष्ट्र के किसानों के अनुभव से मिलेगी पूरे देश को राहत
बैठक में मुख्य रूप से कर्नाटक और महाराष्ट्र के गन्ना किसानों और किसान नेताओं ने अपने क्षेत्रों की जमीनी चुनौतियों को केंद्रीय मंत्रियों के समक्ष रखा। देश में चीनी उत्पादन के मामले में महाराष्ट्र और कर्नाटक अग्रणी राज्यों में गिने जाते हैं, जहाँ सहकारी और निजी दोनों तरह की चीनी मिलों का बड़ा नेटवर्क है। इन राज्यों के किसानों द्वारा उठाए गए मुद्दों को आधार बनाकर जो नीतिगत ढांचा तैयार होगा, उसका सीधा लाभ उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा और तमिलनाडु जैसे अन्य प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों के किसानों को भी मिलेगा।
केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने इस अवसर पर कहा कि खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय चीनी उद्योग और किसानों के बीच एक पारदर्शी कड़ी के रूप में काम करेगा। सरकार का लक्ष्य चीनी मिलों के आर्थिक स्वास्थ्य को बनाए रखने के साथ-साथ किसान के एक-एक दाने की सही कीमत दिलवाना है।
गन्ना किसानों के मुद्दों को लेकर केंद्र सरकार का यह त्वरित और गंभीर रुख निश्चित रूप से देश के ग्रामीण अर्थतंत्र के लिए एक बेहद सुखद और सकारात्मक संकेत है। एक सप्ताह के भीतर कमेटी का गठन और उसमें किसानों की प्रत्यक्ष भागीदारी यह दर्शाती है कि सरकार समस्याओं को टालने के बजाय उनके जड़ से खात्मे के लिए प्रतिबद्ध है। आने वाले दिनों में जब यह पारदर्शी व्यवस्था लागू होगी, तो इससे न केवल गन्ने की खेती अधिक लाभदायक बनेगी, बल्कि किसानों को अपनी फसल का उचित दाम और त्वरित भुगतान मिलने से उनकी आर्थिक रीढ़ और अधिक मजबूत होगी।





