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सावधान! केमिकल से फल पकाना अब पड़ेगा भारी: FSSAI ने देशभर में बढ़ाई सख्ती

कैल्शियम कार्बाइड पर पूर्ण प्रतिबंध

अंकित शर्मा by अंकित शर्मा
April 18, 2026
in खेती-किसानी
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भारत में गर्मी का मौसम शुरू होते ही बाज़ारों में आम, केला और पपीते जैसे फलों की मांग आसमान छूने लगती है। इस मांग को पूरा करने और मोटा मुनाफा कमाने के चक्कर में कई फल व्यवसायी प्राकृतिक तरीके के बजाय रासायनिक तरीकों (Chemical Ripening) का सहारा लेते हैं। इसे देखते हुए भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने एक बड़ा और सख्त कदम उठाया है। प्राधिकरण ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कड़े निर्देश जारी किए हैं कि अवैध रूप से फल पकाने वाले एजेंटों के खिलाफ तत्काल और कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए। अब मंडियों से लेकर कोल्ड स्टोरेज तक, हर उस जगह पर पैनी नज़र रखी जाएगी जहाँ फलों का भंडारण किया जाता है।

कैल्शियम कार्बाइड: क्यों है यह ‘साइलेंट किलर’?

FSSAI ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि ‘कैल्शियम कार्बाइड’ का इस्तेमाल फलों को पकाने के लिए पूरी तरह से प्रतिबंधित है। इसे आम भाषा में ‘मसाला’ कहा जाता है, लेकिन यह असल में एक खतरनाक रसायन है।

  • स्वास्थ्य पर असर: इस केमिकल से निकलने वाली एसिटिलीन गैस में आर्सेनिक और फास्फोरस जैसे जहरीले तत्व होते हैं। इसे खाने से व्यक्ति को सांस लेने में दिक्कत, लगातार उल्टी, पेट में जलन, त्वचा पर छाले और यहाँ तक कि कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियां हो सकती हैं।
  • सख्त निर्देश: प्राधिकरण ने कहा है कि यदि किसी दुकान या गोदाम के पास कैल्शियम कार्बाइड की पुड़िया या अवशेष भी मिलते हैं, तो उसे अपराध का पर्याप्त प्रमाण मानकर सीधे कार्रवाई की जाएगी।

इथेफोन और एथिलीन: क्या सही है और क्या गलत?

अक्सर देखा गया है कि व्यापारी केले और अन्य फलों को पकाने के लिए इथेफोन (Ethephon) के घोल में डुबो देते हैं। FSSAI ने इसे भी नियमों के खिलाफ बताया है।

  1. गलत तरीका: फलों या सब्जियों को सीधे किसी रासायनिक पाउडर या तरल पदार्थ के संपर्क में लाना प्रतिबंधित है।
  2. सही तरीका: प्राधिकरण के अनुसार, फलों को पकाने के लिए केवल ‘एथिलीन गैस’ का नियंत्रित उपयोग ही सुरक्षित माना जाता है। एथिलीन एक प्राकृतिक हार्मोन है जो फलों में खुद भी बनता है, लेकिन इसका उपयोग भी वैज्ञानिक तरीके से ‘राइपनिंग चैंबर’ (Ripening Chamber) में ही होना चाहिए।

मंडियों और गोदामों पर ‘स्पेशल स्ट्राइक’

FSSAI ने सभी राज्यों के खाद्य सुरक्षा आयुक्तों और क्षेत्रीय निदेशकों को निर्देशित किया है कि वे जमीनी स्तर पर अपनी सक्रियता बढ़ाएं।

  • विशेष अभियान: आगामी त्योहारों और गर्मी के पीक सीजन को देखते हुए थोक विक्रेताओं, वितरकों और भंडारण केंद्रों का औचक निरीक्षण (Surprise Inspection) किया जाएगा।
  • स्ट्रिप पेपर टेस्ट: अधिकारियों को सुझाव दिया गया है कि वे गोदामों में एसिटिलीन गैस की मौजूदगी जांचने के लिए आधुनिक तकनीकों जैसे ‘स्ट्रिप पेपर टेस्ट’ का इस्तेमाल करें। इससे बिना किसी लैब टेस्ट के मौके पर ही पता चल जाएगा कि फल अवैध तरीके से पकाए गए हैं या नहीं।

रंगों और मोम के इस्तेमाल पर भी रोक

खबर सिर्फ फल पकाने तक सीमित नहीं है। फलों को ताज़ा और चमकदार दिखाने के लिए उन पर लगाए जाने वाले सिंथेटिक रंगों और मोम (Wax) की कोटिंग पर भी रोक लगाने के निर्देश दिए गए हैं। अक्सर सेब और संतरे जैसे फलों पर वैक्स की परत चढ़ा दी जाती है, जो पेट के लिए बेहद हानिकारक है। FSSAI ने स्पष्ट किया है कि खाद्य पदार्थों की प्राकृतिक सुंदरता से छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

‘खबर किसान की’ विशेष विश्लेषण: किसानों और व्यापारियों के लिए क्या है सबक?

अंकित भाई, आपके पोर्टल के पाठकों (विशेषकर किसानों) के लिए यह समझना जरूरी है कि सरकार की इस सख्ती का उद्देश्य क्या है:

  • गुणवत्ता और साख: जब बाज़ार में केमिकल युक्त फल पकड़े जाते हैं, तो पूरे क्षेत्र की साख खराब होती है और दाम गिर जाते हैं। किसानों को चाहिए कि वे प्राकृतिक तरीकों या प्रमाणित राइपनिंग चैंबर्स का ही उपयोग करें।
  • उपभोक्ता जागरूकता: ग्राहकों में अब जागरूकता बढ़ रही है। वे चटक पीले और बेदाग फलों के बजाय प्राकृतिक दिखने वाले फल पसंद करने लगे हैं।
  • कानूनी पेचीदगियां: एक बार एफएसएसएआई (FSSAI) के घेरे में आने पर व्यापारी का लाइसेंस रद्द होने के साथ-साथ भारी जुर्माना और जेल की सजा भी हो सकती है।

ग्राहकों के लिए सलाह: कैसे पहचानें ‘केमिकल वाले फल’?

  1. रंग की एकरूपता: यदि आम या केला पूरा का पूरा एकदम पीला है और उसमें कहीं भी हरापन नहीं है, तो संभावना है कि उसे केमिकल से पकाया गया है। प्राकृतिक रूप से पके फल में कहीं-कहीं हरे धब्बे हो सकते हैं।
  2. स्वाद और गुदा: केमिकल से पके फल ऊपर से पीले दिखते हैं लेकिन अंदर से कच्चे या बेस्वाद हो सकते हैं।
  3. वजन: जो फल पानी में तैरने लगें, समझिये वे प्राकृतिक रूप से पके हैं। केमिकल से पके फल अक्सर भारी और पानी में डूबने वाले होते हैं।

FSSAI का यह कड़ा रुख देश के करोड़ों नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए है। सरकार का संदेश साफ है—मुनाफाखोरी के लिए लोगों की जान से खिलवाड़ नहीं होने दिया जाएगा। ‘खबर किसान की‘ अपने सभी किसान भाइयों और व्यापारियों से अपील करता है कि वे सरकार के दिशा–निर्देशों का पालन करें और समाज को स्वस्थ फल उपलब्ध कराने में अपना योगदान दें। प्राकृतिक खेती और प्राकृतिक प्रबंधन ही भविष्य की असली कमाई है।

Tags: calcium carbidefruit ripeningFruits Marketfssai
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