वर्तमान में पश्चिम एशिया (Middle East) जिस भीषण संकट और युद्ध की आग में झुलस रहा है, उसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ना लाजिमी है। भारत अपनी खाद और कच्चे तेल की जरूरतों के लिए एक बड़ी हद तक इन क्षेत्रों और समुद्री रास्तों पर निर्भर है। ऐसे में भारतीय किसानों के मन में एक बड़ा सवाल था—”क्या इस बार बुवाई के समय खाद मिल पाएगी?” इस शंका का समाधान स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्यसभा के पटल से किया है। प्रधानमंत्री ने देश के अन्नदाताओं को आश्वस्त किया है कि सरकार हर विपरीत परिस्थिति में उनके साथ खड़ी है और खेतों तक यूरिया व अन्य उर्वरकों की पहुँच में कोई बाधा नहीं आने दी जाएगी।
संसद से सीधी गारंटी: ‘खाद की कमी नहीं होगी’
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने वक्तव्य में साफ तौर पर कहा कि बुवाई का मौसम नजदीक है और सरकार ने इसके लिए पहले ही पुख्ता इंतजाम कर लिए हैं। उन्होंने कहा, “मैं देश के किसानों को यह भरोसा दिलाना चाहता हूँ कि सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है कि खाद और उर्वरकों की पर्याप्त उपलब्धता बनी रहे।” पीएम ने स्पष्ट किया कि युद्ध की स्थितियों को देखते हुए ‘प्रोक्योरमेंट’ (खरीद) और ‘सप्लाई चेन’ को लेकर पहले ही रणनीतिक योजनाएं तैयार कर ली गई हैं।
अतीत की सीख: कोरोना काल का उदाहरण
पीएम मोदी ने याद दिलाया कि जब पूरी दुनिया कोरोना महामारी की चपेट में थी और वैश्विक सप्लाई चेन पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी थी, तब भी भारत ने अपने किसानों को आंच नहीं आने दी।
- कीमतों पर नियंत्रण: उस समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की एक बोरी की कीमत 3000 रुपये तक पहुँच गई थी। लेकिन भारत सरकार ने भारी सब्सिडी का बोझ खुद उठाया और किसानों को वही बोरी मात्र 300 रुपये में उपलब्ध कराई।
- सरकार का संकल्प: प्रधानमंत्री ने कहा कि सरकार की नीति हमेशा से ‘किसान प्रथम’ की रही है, चाहे वह वैश्विक महामारी हो या वर्तमान का युद्ध संकट।
आत्मनिर्भर भारत: 6 नए यूरिया प्लांट और घरेलू उत्पादन
भारत अब केवल आयात पर निर्भर नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने खाद के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर बड़े कदम बढ़ाए हैं:
- नए कारखाने: देश में 6 बंद पड़े या नए यूरिया प्लांट शुरू किए गए हैं, जिससे घरेलू उत्पादन में भारी बढ़ोतरी हुई है।
- विविधता: सरकार ने डीएनपी और एनपीके जैसे जटिल उर्वरकों के आयात के लिए भी नए देशों और सप्लायर्स से संपर्क साधा है ताकि एक ही क्षेत्र पर निर्भरता न रहे।
- नैनो यूरिया: पारंपरिक यूरिया के विकल्प के रूप में ‘नैनो यूरिया’ को बढ़ावा दिया जा रहा है, जो कम लागत में अधिक प्रभावी है और जिसे स्टोर करना व ले जाना आसान है।
सुरक्षित समुद्री गलियारे: होर्मुज से भारत तक का सफर
युद्ध के कारण सबसे बड़ा खतरा समुद्री रास्तों (Maritime Corridors) को लेकर है। पीएम मोदी ने बताया कि भारत सरकार वैश्विक सहयोगियों के साथ निरंतर संपर्क में है ताकि तेल, गैस और फर्टिलाइजर लेकर आने वाले जहाज सुरक्षित रूप से भारतीय बंदरगाहों तक पहुँच सकें। उन्होंने जानकारी दी कि भारत के कूटनीतिक प्रयासों के चलते होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में फंसे कई महत्वपूर्ण जहाज सुरक्षित भारत लौट आए हैं।
अन्न भंडार की मजबूती: ‘भरे हुए हैं कोठार’
युद्ध के दौरान ‘खाद्य सुरक्षा’ (Food Security) सबसे बड़ी चुनौती होती है। इस पर पीएम ने गर्व से कहा कि देश के किसानों की मेहनत का ही परिणाम है कि आज भारत के पास पर्याप्त खाद्यान्न भंडार मौजूद है। “हमारे पास गेहूं और धान की कोई कमी नहीं है, हमारे कोठार भरे हुए हैं,” पीएम ने सदन को बताया। उन्होंने कहा कि खरीफ सीजन के लिए सरकार की तैयारियां पूरी हैं और किसानों को किसी भी तरह की अफवाहों पर ध्यान देने की जरूरत नहीं है।
प्राकृतिक खेती और भविष्य की राह
प्रधानमंत्री ने किसानों से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने और ‘जैविक खेती’ (Organic Farming) को अपनाने की भी अपील की। सरकार का लक्ष्य है कि आने वाले समय में भारतीय कृषि न केवल आत्मनिर्भर बने, बल्कि रसायनों से मुक्त होकर दुनिया के लिए गुणवत्तापूर्ण भोजन का स्रोत भी बने।
संसद में पीएम मोदी का यह बयान केवल एक भाषण नहीं, बल्कि देश के करोड़ों किसानों के लिए एक ‘सुरक्षा कवच‘ की तरह है। युद्ध की अनिश्चितताओं के बीच जब दुनिया सहमी हुई है, तब भारत का नेतृत्व अपने किसानों को खाद, बीज और बाजार की गारंटी दे रहा है। यह स्पष्ट है कि “बीज से लेकर बाजार तक” की जिस रणनीति पर सरकार काम कर रही है, उसका केंद्र केवल और केवल किसान का कल्याण है।




