नई दिल्ली: केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना, राष्ट्रीय गोकुल मिशन, को अपनी निर्धारित समय-सीमा में एक बड़ा झटका लगा है। सरकार ने देसी गायों और भैंसों से दूध उत्पादन को बढ़ाने के लिए जो लक्ष्य तय किया था, उसे अब चार साल आगे बढ़ा दिया गया है। कृषि और पशुपालन संबंधी संसदीय स्थायी समिति की एक रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है, जिसने सरकार की योजना और उसके कार्यान्वयन पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
2025 का लक्ष्य अब 2030 में पूरा होगा
राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत, सरकार का सपना था कि वह वर्ष 2025-26 तक देसी गायों के प्रति वर्ष दूध उत्पादन को 1,924 किलोग्राम से बढ़ाकर 3,000 किलोग्राम तक पहुंचाएगी। हालाँकि, समिति के अध्यक्ष पीसी गद्दी गौडर द्वारा संसद में पेश की गई रिपोर्ट के अनुसार, इस लक्ष्य को प्राप्त करने की अंतिम तिथि अब 2029-30 कर दी गई है। इस बदलाव ने सरकार की उस रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसके तहत यह महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया गया था।
धीमी प्रगति और जमीनी हकीकत से दूरी
समिति ने अपनी समीक्षा में बताया कि सरकार ने लक्ष्य तय करते समय ज़मीनी हकीकत को ठीक से नहीं समझा। रिपोर्ट के अनुसार, देश में दूध उत्पादन में वृद्धि की गति बहुत धीमी है। 2019-20 से 2023-24 के बीच, देसी गायों के दूध उत्पादन में केवल 14.9% की बढ़ोतरी हुई, जबकि भैंसों का दूध उत्पादन मात्र 2.9% ही बढ़ा है। इन दोनों का कुल औसत भी चार वर्षों में केवल 7.2% रहा है।
रिपोर्ट में इस बात पर भी चिंता जताई गई है कि कई राज्यों जैसे बिहार, ओडिशा, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में देसी पशुओं की दूध देने की क्षमता में लगातार गिरावट आ रही है।
फंडिंग का सीमित दायरा
समिति ने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि 2014 से चल रही इस योजना पर अब तक ₹3,687 करोड़ से अधिक खर्च हो चुके हैं, लेकिन इसका लाभ देश के सभी राज्यों तक नहीं पहुँच पाया है। समिति का कहना है कि यह योजना केवल कुछ राज्यों तक ही सीमित रह गई है, जबकि इसकी आवश्यकता पूरे देश में है।
संसदीय समिति ने सरकार से इस मामले को गंभीरता से लेने और यह सुनिश्चित करने को कहा है कि इस योजना का लाभ पूरे देश में समान रूप से पहुँचे। अब यह देखना होगा कि सरकार इस चुनौती से कैसे निपटती है और क्या 2029-30 तक इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य को हासिल किया जा सकेगा।





