पंजाब/राजस्थान, 28 जून 2025: भारत की ग्राम्य संस्कृति और कृषि की जड़ों को फिर से सशक्त करने के संकल्प के साथ, जीव-जंतु कल्याण एवं कृषि शोध संस्थान (AWARI) के अध्यक्ष श्री भारत सिंह राजपुरोहित के नेतृत्व में चल रही ‘गौ राष्ट्र यात्रा’ आज पंजाब और राजस्थान के विभिन्न गाँवों में पहुँची। इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य देसी नस्ल की गायों पर काम कर रहे ब्रीडर्स, गौपालकों और पशुपालकों से सीधा संवाद स्थापित करना, उनकी समस्याओं को सुनना और गौसेवा को एक राष्ट्रव्यापी जनांदोलन का रूप देना है।
यात्रा के पंजाब और राजस्थान के अनुभव: सदियों पुरानी परंपरा का सम्मान
‘गौ राष्ट्र यात्रा’ ने पंजाब और राजस्थान के उन गाँवों का दौरा किया जहाँ देसी गायों का संरक्षण केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि जीवनशैली का अभिन्न अंग है:
- पंजाब चरण की प्रमुख विशेषताएँ:
- यात्रा ने वरियाम खेड़ा स्थित चौधरी रघुवीर सिंह मेमोरियल स्कूल के संस्थापक श्री सौरभ जी के यहाँ पहुँचकर देसी नस्लों के संरक्षण कार्यों का अवलोकन किया।
- ढींगावली गाँव, जो अपनी साहीवाल नस्ल की गायों के लिए विख्यात है, वहाँ चौधरी सुरेंद्र पाल सिहाग के परिवार द्वारा पिछले 100 वर्षों से किए जा रहे अद्भुत संरक्षण प्रयासों की सराहना की गई। यह दिखाता है कि किस तरह पीढ़ियों से गौसेवा की जा रही है।
- राजस्थान में यात्रा की प्रमुख गतिविधियाँ:
- यात्रा ने 4H छोटी, 25F गुलाबेवाला, अरायन और 58RB जैसे गाँवों में देसी गायों पर कार्यरत गौपालकों और ब्रीडर्स से सीधे चर्चा की।
- इस दौरान एसएस ढोल, नरवीर देओल, शमशेर सिंह चानी, जगवीर बरार और पाला राम जाट जैसे समर्पित गौसेवकों ने अपने अनुभव साझा किए। इन क्षेत्रों में, तमाम चुनौतियों के बावजूद, लोग देसी नस्लों की रक्षा कर रहे हैं, जो भारत की आत्मनिर्भर ग्राम्य संस्कृति का एक सच्चा प्रतीक है।

देसी गाय: ग्राम्य अर्थव्यवस्था की रीढ़ और भारत की आत्मा का पुनर्जागरण
AWARI अध्यक्ष श्री भारत सिंह राजपुरोहित ने ‘गौ राष्ट्र यात्रा’ के गहरे महत्व को समझाते हुए कहा, “गौ राष्ट्र यात्रा केवल गाय के संरक्षण की यात्रा नहीं है, यह भारत की आत्मा, ग्राम्य अर्थव्यवस्था और हमारे पारंपरिक कृषि ज्ञान की पुनर्प्राप्ति का संकल्प है।” उन्होंने स्पष्ट किया कि देसी गायें सिर्फ़ दूध का साधन मात्र नहीं हैं, बल्कि वे हमारी संस्कृति, स्वास्थ्य और आत्मनिर्भरता की आधारशिला हैं। राजपुरोहित जी ने कहा कि जब पंजाब और राजस्थान के गाँवों में पाँच-पाँच पीढ़ियाँ देसी नस्लों को सहेजती दिखती हैं, तो यह केवल सेवा नहीं, बल्कि एक अमूल्य सांस्कृतिक उत्तराधिकार है।
उन्होंने आगे बताया कि AWARI संस्था का उद्देश्य सिर्फ़ शोध तक सीमित नहीं है, बल्कि नीति निर्माण, प्रशिक्षण और जन-जागरूकता के माध्यम से देश में देसी नस्लों के लिए एक अनुकूल वातावरण बनाना है। हम चाहते हैं कि हर किसान यह समझे कि देसी गायें घाटे का सौदा नहीं हैं, बल्कि वे स्थायी कृषि और जैविक खेती का मूल आधार हैं, जो अंततः उनकी आय बढ़ाने में सहायक होंगी।

भविष्य की ओर: बीकानेर से आत्मनिर्भर भारत का संदेश
इस यात्रा के माध्यम से एक बेहद स्पष्ट और सशक्त संदेश दिया जा रहा है — “गौ नहीं बचेगी, तो गाँव नहीं बचेगा — और गाँव नहीं बचेगा, तो भारत नहीं बचेगा।” यह अभियान भारत की ग्रामीण जड़ों को फिर से मज़बूत करने और एक स्वस्थ व आत्मनिर्भर राष्ट्र के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
यात्रा का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव अब राजस्थान का बीकानेर जिला है, जहाँ यह देसी नस्लों पर काम कर रहे पशुपालकों, संगठनों और युवाओं के साथ और अधिक संवाद करेगी।





