भारत का गेरकिन (अचार बनाने वाला छोटा खीरा) उद्योग, जो अब तक वैश्विक बाजार में अपनी धाक जमाए हुए था, वर्ष 2026 में एक बड़ी चुनौती का सामना कर रहा है। ताजा व्यापारिक अनुमानों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष में गेरकिन के निर्यात में 10 प्रतिशत तक की बड़ी गिरावट देखी जा सकती है। इस संकट की मुख्य जड़ अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर लगाया गया नया आयात शुल्क (Import Duty) है। हालांकि डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी निर्यातकों को मुद्रा के स्तर पर थोड़ी राहत दे रही है, लेकिन निर्यात की जाने वाली कुल मात्रा (Volume) में कमी आना लगभग तय है।
अमेरिका का ‘टैरिफ कार्ड’ और भारत की मुश्किल
भारत से निर्यात होने वाले कुल गेरकिन का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा अकेले अमेरिका जाता है। ‘इंडियन गेरकिन एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन’ के अध्यक्ष जी.एम. विनोद के अनुसार, अमेरिकी बाजार में आयात शुल्क बढ़ने से भारतीय उत्पाद महंगे हो गए हैं। इसका सीधा असर ऑर्डर्स पर पड़ा है। हालांकि डॉलर मजबूत होने से टर्नओवर के आंकड़े शायद बहुत खराब न दिखें, लेकिन वास्तविक माल की आवाजाही में गिरावट आना चिंता का विषय है।
यूरोप और रूस: नए रास्तों पर खड़े हैं पुराने प्रतिस्पर्धी
जब अमेरिका जैसा बड़ा बाजार हाथ से फिसलता है, तो निर्यातक यूरोप और रूस जैसे वैकल्पिक बाजारों की ओर रुख करते हैं। लेकिन यहाँ भी राह आसान नहीं है।
- तुर्की की चुनौती: यूरोप के बाजार में तुर्की भारत का सबसे बड़ा और सीधा प्रतिद्वंद्वी बनकर उभरा है।
- स्थानीय उत्पादन: पूर्वी यूरोप के देशों और रूस में गेरकिन की अपनी अच्छी पैदावार होती है, जिससे भारतीय निर्यातकों को वहाँ सही कीमतें (Competitive Prices) नहीं मिल पा रही हैं।
निर्यात के आंकड़ों का विरोधाभास
अगर हम सरकारी संस्था ‘एपीडा’ (APEDA) के चालू वित्त वर्ष (अप्रैल-अक्टूबर) के आंकड़ों को देखें, तो निर्यात मूल्य के लिहाज से 169.71 मिलियन डॉलर रहा, जो पिछले साल (159.02 मिलियन डॉलर) से अधिक है। मात्रा के मामले में भी यह 1.69 लाख टन पहुँचा है। लेकिन निर्यातकों का मानना है कि यह बढ़त पुराने ऑर्डर्स और डॉलर की कीमत के कारण है। असली गिरावट आगामी महीनों में साफ़ दिखाई देगी, क्योंकि अमेरिकी टैरिफ का असर अब पूरी तरह से बाजार पर हावी होने लगा है।
उत्पादन में कटौती: किसानों और निर्यातकों पर दोहरी मार
निर्यात की अनिश्चितता को देखते हुए कई बड़ी कंपनियों ने उत्पादन में कटौती करने का फैसला लिया है। गेरकिन की खेती भारत में मुख्य रूप से कर्नाटक और तमिलनाडु में ‘अनुबंध खेती’ (Contract Farming) के तहत की जाती है। चूंकि भारत के घरेलू बाजार में इस खास किस्म के खीरे की मांग लगभग शून्य है, इसलिए इसकी पूरी खेती केवल विदेशी ऑर्डर्स पर टिकी है।
निर्यातकों ने किसानों के साथ किए जाने वाले अनुबंधों में कमी की है, जिसका सीधा असर दक्षिण भारत के हजारों किसानों की आय पर पड़ने वाला है।
सरकार से क्या हैं उम्मीदें?
निर्यातक प्रदीप पूवैया का कहना है कि गेरकिन की स्थिति सीफूड या झींगा उद्योग जैसी नहीं है, जिसके लिए ढेरों वैकल्पिक बाजार उपलब्ध हों। ऐसे में सरकारी मदद ही एकमात्र सहारा है। उद्योग जगत सरकार से दो मुख्य मांगें कर रहा है:
- ब्याज छूट: व्यापार नीति के तहत घोषित 3 प्रतिशत ब्याज छूट का लाभ जल्द मिले।
- जीएसटी रिफंड: फिलहाल जीएसटी रिफंड मिलने में 30 से 40 दिन का समय लग रहा है, जिससे कंपनियों की वर्किंग कैपिटल (कार्यशील पूंजी) अटक जाती है। इसे सुव्यवस्थित करने की जरूरत है।
भारतीय गेरकिन उद्योग फिलहाल एक दोराहे पर खड़ा है। एक तरफ अमेरिकी टैरिफ की चुनौती है, तो दूसरी तरफ रूस और यूरोप में बढ़ती प्रतिस्पर्धा। ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के साथ हुए नए व्यापार समझौतों से कुछ उम्मीद की किरण जरूर दिखती है, लेकिन वहां निर्यात की मात्रा फिलहाल इतनी नहीं है कि अमेरिका की भरपाई कर सके। आने वाले समय में तकनीक और लागत प्रबंधन ही इस उद्योग को वैश्विक बाजार में टिके रहने में मदद करेगा।
विशेष डेटा: गेरकिन निर्यात का तुलनात्मक विश्लेषण
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विवरण |
वित्त वर्ष 2024-25 (पूरा साल) |
चालू वित्त वर्ष (अप्रैल–अक्टूबर) |
2026 का अनुमान |
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निर्यात मूल्य |
$306.72 Million |
$169.71 Million |
गिरावट की आशंका |
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निर्यात मात्रा |
2.89 Lakh Tonnes |
1.69 Lakh Tonnes |
-10% संभावित कमी |
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प्रमुख बाजार |
अमेरिका (25%) |
अमेरिका, यूरोप, रूस |
विविधता की तलाश |





