उत्तर प्रदेश के कृषि परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कुशल क्रियान्वयन के कारण प्रदेश के किसानों का रुझान अब ‘श्रीअन्न’ (मिलेट्स) की ओर तेजी से बढ़ा है। खरीफ विपणन वर्ष 2025-26 के दौरान हुई सरकारी खरीद के आंकड़ों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि किसान अब बिचौलियों के बजाय सीधे सरकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर अपनी फसल बेचना पसंद कर रहे हैं। इस वर्ष बाजरा, ज्वार और मक्का की खरीद ने न केवल लक्ष्य को पार किया, बल्कि भुगतान के मामले में भी राज्य सरकार ने तत्परता दिखाते हुए किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त किया है।
बाजरा खरीद में ऐतिहासिक सफलता: उत्पादन हुआ दोगुना
इस साल की सबसे बड़ी खबर बाजरा की खेती और उसकी सरकारी खरीद को लेकर आई है। पिछले वित्तीय वर्ष (2024-25) की तुलना में इस साल बाजरा की खरीद में 100 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है। जहाँ बीते वर्ष लगभग 1.01 लाख मीट्रिक टन बाजरा खरीदा गया था, वहीं इस साल यह बढ़कर 2.13 लाख मीट्रिक टन के पार पहुँच गया है।
इस भारी बढ़त का सबसे सुखद पहलू किसानों को मिलने वाला भुगतान है। पिछले साल जहाँ किसानों को लगभग 268 करोड़ रुपये मिले थे, वहीं इस बार सरकार ने 598 करोड़ रुपये से अधिक की राशि सीधे अन्नदाताओं के खातों में भेजी है। आगरा, अलीगढ़ और प्रयागराज जैसे 33 जनपदों में बाजरा की खेती अब लाभ का सौदा साबित हो रही है।
ज्वार और मक्का उत्पादकों की भी बढ़ी आमदनी
सिर्फ बाजरा ही नहीं, बल्कि ज्वार और मक्का की खेती करने वाले किसानों ने भी सरकारी नीतियों का भरपूर लाभ उठाया है।
- ज्वार की स्थिति: बांदा, हमीरपुर और फतेहपुर समेत 11 प्रमुख जनपदों में ज्वार की व्यापक खरीद की गई। यहाँ 13 हजार से अधिक किसानों से लगभग 43,562 मीट्रिक टन ज्वार लिया गया, जिसके बदले उन्हें 162 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया। विशेष रूप से ‘मालदांडी’ किस्म के लिए सरकार ने 3749 रुपये प्रति क्विंटल का आकर्षक भाव दिया।
- मक्का का बाजार: बदायूं, कन्नौज और हरदोई जैसे 25 जिलों में मक्का की खरीद भी सुचारू रूप से चली। यहाँ 13 हजार मीट्रिक टन से अधिक की खरीद पर किसानों को करीब 32 करोड़ रुपये मिले। सरकार द्वारा तय 2400 रुपये प्रति क्विंटल की दर ने किसानों को बाजार के उतार-चढ़ाव से सुरक्षा प्रदान की।
क्यों बढ़ा किसानों का भरोसा?
विशेषज्ञों का मानना है कि ‘श्रीअन्न’ की खेती में लागत बहुत कम आती है। इन्हें उगाने के लिए न तो अधिक पानी की जरूरत होती है और न ही बहुत महंगे कीटनाशकों की। ऐसे में जब सरकार ने बाजरा के लिए 2775 रुपये और ज्वार के लिए ऊँची एमएसपी तय की, तो किसानों के लिए मुनाफे का गणित पूरी तरह बदल गया। 1 अक्टूबर से शुरू हुई पारदर्शी खरीद प्रक्रिया ने यह सुनिश्चित किया कि किसानों को समय पर भुगतान मिले और उन्हें मंडियों के चक्कर न काटने पड़ें।
आत्मनिर्भरता और ‘मिलेट्स हब’ की ओर कदम
उत्तर प्रदेश अब धीरे-धीरे देश के मिलेट्स हब के रूप में अपनी पहचान बना रहा है। पारंपरिक गेहूं और धान की फसलों के साथ-साथ अब ज्वार, बाजरा और मक्का जैसे पौष्टिक अनाज प्रदेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्राथमिकता ग्रामीण क्षेत्रों को विकास की धुरी बनाना है, और श्रीअन्न इस लक्ष्य की प्राप्ति में सबसे बड़ा हथियार साबित हो रहा है।
मिलेट्स की इस बंपर खरीद ने यह साबित कर दिया है कि यदि सही सरकारी समर्थन और पारदर्शी व्यवस्था मिले, तो किसान किसी भी चुनौती को अवसर में बदल सकते हैं। उत्तर प्रदेश के किसान अब केवल खेती नहीं कर रहे, बल्कि वे आधुनिक और व्यावसायिक कृषि की ओर कदम बढ़ा चुके हैं। यह बदलाव न केवल पोषण सुरक्षा प्रदान करेगा, बल्कि प्रदेश को ‘वन ट्रिलियन इकोनॉमी‘ बनाने के संकल्प को भी मजबूती देगा।





