भारत के बासमती चावल की खुशबू पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है, लेकिन वर्तमान में इस सुगंधित चावल के व्यापार पर अनिश्चितता के काले बादल छा गए हैं। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की एक हालिया चेतावनी ने भारतीय चावल निर्यातकों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। ट्रंप ने ईरान के साथ व्यापारिक संबंध रखने वाले देशों पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क (Tariff) लगाने की धमकी दी है। चूंकि ईरान भारतीय बासमती का तीसरा सबसे बड़ा खरीदार है, इसलिए इस घोषणा का सीधा असर अब हरियाणा और पंजाब की अनाज मंडियों में कीमतों की गिरावट के रूप में दिखने लगा है।
ईरान: बासमती निर्यात की रीढ़
अगर आंकड़ों के चश्मे से देखें, तो भारतीय बासमती के लिए ईरान का बाजार ‘ऑक्सीजन’ की तरह है। वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान भारत ने कुल 5,944.49 मिलियन डॉलर मूल्य का बासमती निर्यात किया, जिसमें से अकेले ईरान की हिस्सेदारी 753.20 मिलियन डॉलर रही। मात्रा के लिहाज से भारत ने कुल 60.65 लाख टन चावल बाहर भेजा, जिसमें से 8.55 लाख टन ईरान ने खरीदा। सऊदी अरब और इराक के बाद ईरान ही वह मुल्क है जो भारतीय बासमती के निर्यात को स्थिरता प्रदान करता रहा है।
चालू वित्त वर्ष में बढ़ा ईरान का भरोसा
हैरानी की बात यह है कि चालू वित्त वर्ष (अप्रैल-नवंबर 2025) में जहां सऊदी अरब और इराक जैसे बड़े बाजारों से मांग में कमी देखी गई, वहीं ईरान को होने वाले निर्यात में 20.9 प्रतिशत की तेज बढ़त दर्ज की गई। इस दौरान भारत ने करीब 5.99 लाख टन चावल ईरान को भेजा। इससे यह स्पष्ट होता है कि हाल के महीनों में ईरान भारतीय निर्यातकों के लिए सबसे भरोसेमंद गंतव्य बनकर उभरा था, लेकिन अब ट्रंप की एक धमकी ने इस बढ़त पर ब्रेक लगा दिया है।
दुबई के रास्ते ‘सुरक्षित’ व्यापार पर भी संकट
भारतीय बासमती का एक बड़ा हिस्सा सीधे ईरान न जाकर दुबई (UAE) के रास्ते वहां पहुँचता है। निर्यातक दुबई के मजबूत और सुरक्षित बैंकिंग सिस्टम का उपयोग करते हुए माल भेजते हैं, जहाँ से इसे आगे ईरान रवाना किया जाता है। इस रूट को सरकारी टेंडरों और भुगतान की सुरक्षा के लिहाज से सबसे उत्तम माना जाता रहा है। हालांकि, अब अमेरिका के कड़े रुख के बाद इस ‘वैकल्पिक रास्ते’ पर भी सख्ती बढ़ने की संभावना है, जिससे निर्यातकों ने नए सौदे करना बंद कर दिया है।
मंडियों में ‘पूसा’ किस्मों के भाव धराशायी
इस वैश्विक हलचल का सबसे दर्दनाक असर हरियाणा की मंडियों में देखने को मिल रहा है। कीमतों का ग्राफ कुछ इस तरह गिरा है:
- पूसा बासमती-1509: जो अक्टूबर में 54 रुपये से बढ़कर दिसंबर में 68 रुपये प्रति किलो तक पहुँच गया था, अब लुढ़ककर 63–64 रुपये पर आ गया है।
- पूसा बासमती-1718: इसके थोक दाम भी 70 रुपये प्रति किलो के उच्च स्तर से फिसलकर अब 65–66 रुपये के दायरे में सिमट गए हैं।
निर्यातकों का कहना है कि भुगतान फंसने की आशंका के चलते वे अभी खरीदारी से बच रहे हैं, जिसका खामियाजा सीधे किसानों को भुगतना पड़ रहा है।
ईरान की आंतरिक आर्थिक बदहाली ने बढ़ाई आग
मुसीबत केवल अमेरिका की तरफ से नहीं है, बल्कि ईरान की अपनी आर्थिक स्थिति भी व्यापार के अनुकूल नहीं रही। ईरान सरकार ने 1 जनवरी से जरूरी वस्तुओं के आयात पर मिलने वाली मुद्रा सब्सिडी खत्म कर दी है। पहले आयातकों को डॉलर 28,000 तोमान की दर पर मिलता था, जो अब खुले बाजार में 1,30,000 तोमान के पार पहुँच गया है। इससे ईरान के भीतर आयातित चावल की कीमतें आसमान छूने लगी हैं, जिससे वहां मांग कम हुई है और विरोध प्रदर्शनों का दौर शुरू हो गया है।
इतिहास खुद को दोहराने की कगार पर?
भारतीय बासमती व्यापार ने ऐसा ही एक बड़ा झटका 2018-19 में झेला था। उस वक्त ईरान को निर्यात अपने चरम पर था (करीब 1.5 अरब डॉलर), लेकिन ट्रंप प्रशासन के प्रतिबंधों के कारण करोड़ों रुपये का भुगतान अटक गया था। आज फिर से वही स्थिति बनती दिख रही है। एक तरफ ट्रंप की टैरिफ की धमकी है और दूसरी तरफ ईरान की अपनी वित्तीय अस्थिरता।
बासमती के व्यापार पर मंडराता यह संकट केवल निर्यातकों का नहीं, बल्कि उन हजारों किसानों का है जिन्होंने उम्मीद में अच्छी फसल उगाई थी। यदि भारत सरकार जल्द ही कूटनीतिक स्तर पर बातचीत कर कोई समाधान नहीं निकालती, तो बासमती की कीमतों में और अधिक गिरावट आ सकती है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गहरा धक्का लगेगा।





