देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में जानलेवा वायु प्रदूषण के संकट पर सुनवाई करते हुए एक दूरगामी और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि प्रदूषण की समस्या को अब केवल सर्दी के मौसम में ‘रूटीन’ सूचीबद्ध होने वाले एक सामान्य मामले की तरह नहीं देखा जाएगा। बल्कि, इस गंभीर समस्या के अल्पकालिक (Short-term) और दीर्घकालिक (Long-term) समाधानों पर लगातार नज़र रखने के लिए, मामले की सुनवाई अब सालभर, महीने में दो बार नियमित तौर पर की जाएगी।
यह निर्णय न केवल प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियों के लिए एक बड़ी चेतावनी है, बल्कि उन किसानों के लिए भी एक बड़ी राहत है जिन्हें हर साल दिल्ली-एनसीआर के ज़हरीले धुएं के लिए मुख्य रूप से दोषी ठहराया जाता रहा है।
1. कोविड लॉकडाउन का सवाल: जब पराली थी, तब आसमान नीला क्यों था?
कोर्ट की सुनवाई के दौरान, चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने दिल्ली-एनसीआर में वायु गुणवत्ता ख़राब होने के मुख्य कारण के रूप में केवल पराली जलाने पर दोष मढ़ने की सामान्य धारणा पर सवाल उठाया।
चीफ़ जस्टिस, जो स्वयं हरियाणा के हिसार से किसान परिवार से आते हैं, ने एक तीखी और विचारोत्तेजक टिप्पणी की:
सुप्रीम कोर्ट का सवाल: “कोविड लॉकडाउन के दौरान भी पराली जलाने की प्रक्रिया सामान्य रूप से हुई थी, लेकिन तब भी दिल्ली का आसमान पूरी तरह से साफ़ और नीला क्यों था? लोग तारे क्यों देख पा रहे थे? इसका मतलब है कि प्रदूषण के कई दूसरे कारक भी बड़े पैमाने पर काम कर रहे हैं, जिनकी अनदेखी की जा रही है।”
कोर्ट की यह टिप्पणी प्रदूषण नियंत्रण नीति निर्माताओं को यह सोचने पर मजबूर करती है कि समस्या की जड़ें केवल खेतों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये शहरी और औद्योगिक विस्तार में गहरी हैं।
2. ‘अहंकार’ का मसला न बने पराली: किसानों पर दोष डालना ग़लत
सुप्रीम कोर्ट ने इस संवेदनशील मुद्दे को अनावश्यक रूप से राजनीतिक मुद्दा या अहंकार का विषय न बनाने की चेतावनी दी। न्यायालय ने किसानों के प्रति संवेदनशील रुख अपनाते हुए कहा कि उन पर दोष डालना बिल्कुल भी ठीक नहीं है, खासकर जब उनका प्रतिनिधित्व इस अदालत में बहुत कम है।
चीफ़ जस्टिस ने कहा कि दिल्ली की हवा में ज़हर घोलने वाले कारकों में पराली जलाना, वाहन प्रदूषण, निर्माण से उड़ने वाली धूल, सड़क की धूल और बायोमास बर्निंग शामिल हैं। कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि समान रूप से सभी स्रोतों पर काम करने की ज़रूरत है, न कि केवल एक पर फोकस करने की।
3. केंद्र सरकार से तत्काल और दीर्घकालिक उपायों पर रिपोर्ट तलब
कोर्ट ने केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी से कहा कि वह केवल अक्टूबर-नवंबर में लिए गए कदमों की जानकारी न दें, बल्कि वायु प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए उठाए जा रहे अल्पकालिक और दीर्घकालिक उपायों की पूरी जानकारी दें।
बेंच ने कहा कि हम एक हफ्ते के अंदर उन सभी वजहों पर नियंत्रण के लिए उठाए गए कदमों की एक विस्तृत रिपोर्ट चाहते हैं। कोर्ट यह सुनिश्चित करना चाहता है कि उपाय केवल ‘कागजों पर’ न हों, बल्कि ज़मीन पर उनका प्रभावी क्रियान्वयन हो। CAQM (वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग) और CPCB (केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड) जैसी एजेंसियों की कार्ययोजनाओं की प्रभावशीलता को अब नियमित रूप से परखा जाएगा।
4. अनियोजित विकास और जीवन की गुणवत्ता पर चिंता
सुनवाई के दौरान बेंच ने भारत के शहरों के अनियोजित शहरी विकास और बेतहाशा बढ़ती जनसंख्या के कारण पैदा हुई चुनौतियों पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की।
चीफ़ जस्टिस ने टिप्पणी की कि देश का कोई भी शहर इतनी बड़ी आबादी को समायोजित करने या इस सोच के साथ विकसित नहीं किया गया था कि हर घर में कई-कई कारें होंगी। उन्होंने रेखांकित किया कि शहरों का विकास नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव नहीं डालना चाहिए। यह टिप्पणी इंगित करती है कि कोर्ट अब प्रदूषण को सिर्फ़ कृषि समस्या नहीं, बल्कि एक व्यापक शहरी योजना और प्रशासनिक विफलता के रूप में देख रहा है।
5. साल भर होगी निगरानी: समाधान विशेषज्ञों से ही आएगा
न्यायालय ने इस मामले की सुनवाई को सालभर, महीने में दो बार करने का जो फैसला लिया है, वह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि प्रदूषण को अब किसी भी मौसम में नज़रअंदाज़ नहीं किया जाएगा। बेंच ने कहा:
कोर्ट का रुख: “हम हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठ सकते। समाधान विशेषज्ञों से ही आने चाहिए। अदालत के पास वह समाधान हो या न हो, लेकिन हम सभी हितधारकों को चर्चा के लिए एक मंच दे सकते हैं, और यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि उपाय लागू हों।”
बेंच ने यह भी आदेश दिया कि वैज्ञानिक विश्लेषण होना चाहिए ताकि यह पता चल सके कि कौन सा कारक इस समस्या में सबसे अधिक योगदान दे रहा है।





