दुनिया के एक कोने में जब मिसाइलें चलती हैं, तो उसका असर दूसरे कोने के खेतों और मंडियों में महसूस किया जाता है। वर्तमान में मध्य पूर्व (Middle East) में जारी अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच का तनाव अब भारत के ‘सफेद सोने’ यानी बासमती चावल के लिए काल बन गया है। मध्य प्रदेश, जो अपनी खुशबूदार बासमती के लिए दुनिया भर में मशहूर है, आज एक बड़े आर्थिक संकट के मुहाने पर खड़ा है। निर्यात रुकने से न केवल व्यापारियों की नींद उड़ी है, बल्कि आम किसान भी अपनी मेहनत की फसल के दाम गिरते देख परेशान है।
4 लाख टन का ‘समुद्री कारावास’
ताजा रिपोर्टों के अनुसार, लगभग 4 लाख टन बासमती चावल के कंसाइनमेंट इस समय समुद्र के बीचों-बीच या विभिन्न पोर्ट्स पर फंसे हुए हैं। ईरान का प्रमुख ‘बंदर अब्बास’ पोर्ट, जो भारतीय चावल के लिए प्रवेश द्वार माना जाता है, युद्ध की स्थिति के कारण लगभग ठप हो गया है। निर्यातकों का कहना है कि जो माल रास्ते में है, उसका भविष्य अधर में लटका है, और जो बंदरगाहों पर पहुँच चुका है, उसे अनलोड करना असंभव हो गया है।
कीमतों का गणित: ₹1000 प्रति क्विंटल की चपत
बाजार का सीधा नियम है—मांग घटेगी तो दाम गिरेंगे। निर्यात पूरी तरह बंद होने और घरेलू मंडियों में स्टॉक बढ़ने के कारण बासमती की कीमतों में $₹1000$ प्रति क्विंटल तक की गिरावट दर्ज की गई है।
- प्रभावित किस्में: 1121, 1509, सुगंधा और शरबती जैसी प्रीमियम किस्मों की डिमांड खाड़ी देशों में सबसे ज्यादा रहती है। निर्यात रुकने से इनका भाव औंधे मुंह गिर गया है।
- व्यापारियों का डर: डिमांड शून्य होने से मिलर्स ने नई खरीद बंद कर दी है, जिससे मंडियों में सन्नाटा पसर गया है।
शिपिंग का ‘खूनी’ खर्च: $2000 से $9000 का सफर
लाल सागर (Red Sea) रूट पर जारी अस्थिरता ने शिपिंग कंपनियों को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है।
- भाड़े में उछाल: पहले जिस एक कंटेनर को भेजने का खर्च लगभग $2000 डॉलर आता था, वह अब बढ़कर $9000 डॉलर के पार पहुँच गया है।
- प्रति किलो बोझ: निर्यातकों के अनुसार, प्रति किलो चावल पर $8$ से $10$ रुपये का अतिरिक्त बोझ केवल शिपिंग और इंश्योरेंस के कारण बढ़ गया है।
- डंपिंग का खतरा: शिपिंग कंपनियां रिस्क लेने को तैयार नहीं हैं। वे माल को गंतव्य (Destination) तक पहुँचाने के बजाय सुरक्षित पोर्ट्स पर डंप कर रही हैं, जिससे माल खराब होने और अतिरिक्त ‘डेमुरेज’ चार्ज लगने का खतरा बढ़ गया है।
रायसेन: मध्य प्रदेश के बासमती हब पर संकट
मध्य प्रदेश का रायसेन जिला बासमती के निर्यात में अग्रणी भूमिका निभाता है। यहाँ की ‘अपर्णा फूड मिल एसोसिएशन’ के अध्यक्ष सचिन वर्मा के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय टैक्स और युद्ध की अनिश्चितता ने स्थानीय मिलर्स की कमर तोड़ दी है। रायसेन से ईरान जाने वाला बड़ा हिस्सा अब गोदामों में सड़ने की कगार पर है। व्यापारियों का कहना है कि शिपिंग लाइनों में अस्थिरता के कारण $2000-2500$ डॉलर प्रति घंटा के रेट से एक्स्ट्रा चार्ज वसूले जा रहे हैं, जो किसी भी छोटे या मंझोले निर्यातक के लिए वहन करना मुमकिन नहीं है।
इंडस्ट्री कोलैप्स होने की चेतावनी
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह युद्ध लंबा खिंचा, तो पूरी बासमती इंडस्ट्री ‘कोलैप्स’ हो सकती है। इसका असर केवल मध्य प्रदेश पर ही नहीं, बल्कि हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के किसानों पर भी पड़ेगा।
- स्टॉक का अंबार: अगर सऊदी अरब, इराक और ईरान को सप्लाई नहीं हुई, तो भारत में चावल का इतना स्टॉक जमा हो जाएगा कि अगले सीजन में किसानों को “पानी के मोल” भी दाम नहीं मिलेंगे।
- विदेशी मुद्रा की हानि: डॉलर की कमाई रुकने से देश के व्यापार घाटे पर भी असर पड़ेगा।
सरकार से गुहार: राहत पैकेज की मांग
निर्यातकों और किसान यूनियनों ने सरकार से तुरंत कूटनीतिक हस्तक्षेप की अपील की है। उनकी प्रमुख मांगें निम्नलिखित हैं:
- बंदर अब्बास और अन्य पोर्ट्स पर फंसे माल पर डेमुरेज (Demurrage) और एक्स्ट्रा चार्ज माफ किए जाएं।
- बासमती एक्सपोर्टर्स के लिए विशेष राहत पैकेज की घोषणा हो।
- माल को सुरक्षित निकालने के लिए वैकल्पिक समुद्री रास्तों या कूटनीतिक रास्तों पर काम किया जाए।
बासमती निर्यात का यह संकट केवल व्यापारियों तक सीमित नहीं रहेगा। यदि स्टॉक घरेलू बाजार में खपाया गया तो कुछ समय के लिए दाम गिरेंगे, लेकिन लंबे समय में यह मिलों के बंद होने और बेरोजगारी का कारण बनेगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डॉलर की कमी और तेल की बढ़ती कीमतें मिलकर महंगाई का एक नया चक्र शुरू कर सकती हैं। बासमती उद्योग अब केवल शांति की दुआ कर रहा है, क्योंकि युद्ध की हर एक गोली भारतीय किसान की जेब पर चल रही है।




