भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच लंबे समय से प्रतीक्षित व्यापारिक समझौते पर आखिरकार मुहर लग गई है। इस संधि के तहत वेनेजुएला से कच्चे तेल की खरीद और रणनीतिक ऊर्जा सहयोग जैसे बड़े विषयों को हरी झंडी मिल गई है, लेकिन भारत सरकार ने एक साहसिक निर्णय लेते हुए देश के कृषि और डेयरी क्षेत्रों को इस समझौते के दायरे से बाहर रखा है। यह कदम दर्शाता है कि सरकार के लिए वैश्विक व्यापार समझौतों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण देश के करोड़ों किसानों और पशुपालकों की आजीविका है।
संवेदनशील सेक्टर्स को क्यों दी गई सुरक्षा?
आधिकारिक सूत्रों और वाणिज्य मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, कृषि और डेयरी भारत के लिए ‘संवेदनशील’ (Sensitive) क्षेत्र हैं। भारत ने स्पष्ट किया है कि भले ही वह अमेरिकी बाज़ार में अपनी पहुँच बढ़ाना चाहता है, लेकिन वह इसकी कीमत अपने ग्रामीण अर्थतंत्र को दांव पर लगाकर नहीं चुकाएगा। इस सुरक्षा कवच का मुख्य उद्देश्य भारतीय पशुपालकों और सीमांत किसानों को विदेशी, विशेषकर अमेरिकी, सस्ते उत्पादों की बाढ़ से बचाना है।
असंतुलित मुकाबला: मशीनीकृत खेती बनाम हाथ की मेहनत
भारत और अमेरिका के कृषि ढांचे में जमीन-आसमान का अंतर है, जो इस सुरक्षा को अनिवार्य बनाता है:
- मशीनीकरण का स्तर: अमेरिका में खेती और डेयरी पूरी तरह से आधुनिक मशीनों और विशाल कॉर्पोरेट फर्मों के नियंत्रण में है। वहाँ हज़ारों एकड़ के फार्म और हज़ारों गायों के बड़े डेयरी प्लांट हैं।
- भारत की वास्तविकता: इसके विपरीत, भारत का कृषि क्षेत्र आज भी लगभग 45 प्रतिशत आबादी को रोजगार देता है। यहाँ का डेयरी सेक्टर छोटे किसानों की मेहनत पर टिका है, जिनके पास औसतन केवल 1 या 2 मवेशी होते हैं।
- लागत और सब्सिडी: विकसित देश अपने किसानों को भारी सब्सिडी देते हैं, जिससे उनके उत्पादों की लागत बहुत कम हो जाती है। यदि इन पर आयात शुल्क (Tariff) हटा दिया जाता, तो भारतीय बाज़ार सस्ते अमेरिकी दूध और अनाज से भर जाते, जिससे हमारे छोटे किसान प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं पाते।
आजीविका पर संकट का खतरा
वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने इस निर्णय को सही ठहराते हुए कहा कि भारतीय किसानों के हितों से कोई समझौता संभव नहीं है। यदि ट्रेड डील के तहत अमेरिकी डेयरी उत्पादों को रियायत दी जाती, तो भारतीय किसानों को सालाना करोड़ों रुपये का घाटा उठाना पड़ता। बाज़ार में विदेशी उत्पादों की मौजूदगी से स्थानीय दूध और फसलों के दाम गिर जाते, जिससे ग्रामीण भारत में आर्थिक संकट खड़ा हो सकता था।
एक्सपोर्टर्स के लिए खुशखबरी: टैक्स में कटौती
जहाँ खेती और डेयरी को बचाया गया है, वहीं अन्य क्षेत्रों में भारतीय निर्यातकों के लिए अच्छी खबर है। समझौते के तहत भारतीय सामानों के आयात पर लगने वाले टैरिफ को 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया है। इससे भारतीय मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और एक्सपोर्टर्स को अमेरिकी बाज़ार में बड़ी बढ़त मिलेगी और देश में विदेशी मुद्रा का भंडार बढ़ेगा।
भारत–अमेरिका के बीच हुई यह डील इस बात का प्रमाण है कि भारत अब एक जागरूक और स्वाभिमानी आर्थिक शक्ति के रूप में उभर रहा है। ऊर्जा की ज़रूरतों को पूरा करना और एक्सपोर्ट बढ़ाना ज़रूरी है, लेकिन इसे ‘अन्नदाता‘ की कीमत पर नहीं किया जाएगा। संवेदनशील क्षेत्रों को समझौते से दूर रखकर सरकार ने यह संदेश दिया है कि ग्रामीण भारत की मजबूती ही देश की असली ताकत है।





