भारत के कृषि इतिहास में कुछ क्षण ऐसे आते हैं जो आने वाले दशकों की तस्वीर बदल देते हैं। हाल ही में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा “कपास हार्वेस्टिंग मशीन” को देश के किसानों को समर्पित करना, वैसा ही एक ऐतिहासिक पल है। कपास, जिसे ‘सफेद सोना’ (White Gold) कहा जाता है, भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। लेकिन इसकी खेती में सबसे बड़ी बाधा इसकी तुड़ाई (Picking) रही है। अब, भोपाल के वैज्ञानिकों की मेहनत ने इस बाधा को जड़ से खत्म करने का समाधान खोज निकाला है।
क्या है यह तकनीक? भोपाल के वैज्ञानिकों का कमाल
इस मशीन का विकास मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में स्थित केंद्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान (CIAE) द्वारा किया गया है। यह संस्थान पिछले कई दशकों से भारतीय खेती के अनुकूल स्वदेशी मशीनें बनाने में अग्रणी रहा है। इस कपास हार्वेस्टिंग मशीन की सबसे बड़ी खासियत इसका स्वदेशी होना है। अभी तक जो मशीनें उपलब्ध थीं, वे या तो बहुत महंगी थीं या बड़े खेतों के लिए डिजाइन की गई थीं, लेकिन यह नई मशीन भारतीय छोटे और सीमांत किसानों की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर बनाई गई है।
कपास की पारंपरिक तुड़ाई की चुनौतियाँ: एक कड़वा सच
भारत में कपास की तुड़ाई का काम सदियों से पारंपरिक तरीके से हाथों द्वारा किया जाता रहा है। एक औसत किसान को अपने पूरे खेत की कपास चुनने के लिए दर्जनों मज़दूरों की ज़रूरत पड़ती है। इसमें कई बड़ी समस्याएं थीं:
- मज़दूरों की कमी: बुवाई के समय मज़दूर मिल जाते हैं, लेकिन तुड़ाई के समय अक्सर मज़दूरों की किल्लत हो जाती है।
- बढ़ती लागत: तुड़ाई की मज़दूरी इतनी बढ़ गई है कि किसान के हाथ में मुनाफे का बहुत छोटा हिस्सा ही आता है।
- शारीरिक कष्ट: घंटों तक झुककर कपास चुनना और कपास के छिलकों के कांटों से हाथों का छलनी होना किसानों की नियति बन चुका था।
- समय का अभाव: हाथों से तुड़ाई में हफ़्तों लग जाते हैं, जिससे फसल के खराब होने या मौसम की मार पड़ने का खतरा बना रहता है।
कैसे काम करती है यह मशीन?
कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने स्वयं इस मशीन का अवलोकन किया और इसके कार्य करने की सुगमता को सराहा। यह मशीन पौधों से कपास को बेहद सावधानी से खींचती है, जिससे पौधे को नुकसान नहीं पहुँचता और रुई की गुणवत्ता भी बनी रहती है। यह मशीन कम समय में कई एकड़ की तुड़ाई करने में सक्षम है। इसकी संरचना ऐसी है कि इसे चलाना और इसका रखरखाव करना भी बेहद सरल है।
शिवराज सिंह चौहान का विज़न: ‘X’ पर साझा की अपनी भावनाएं
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘आत्मनिर्भर भारत’ के सपने को कृषि क्षेत्र में उतारने के संकल्प के साथ, शिवराज सिंह चौहान ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर अपनी खुशी साझा की। उन्होंने कहा कि किसानों की यह मांग दशकों पुरानी थी। उन्होंने लिखा, “आज का दिन हमारे अन्नदाताओं के लिए विशेष है। जिस काम को करने में हमारे किसानों का पसीना बहता था और घंटों की मेहनत के बाद भी लागत बढ़ जाती थी, अब वह काम यह आधुनिक मशीन करेगी।” मंत्री जी का यह बयान दर्शाता है कि सरकार केवल योजनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि वह तकनीक के माध्यम से खेती को आसान बनाने पर काम कर रही है।
आर्थिक प्रभाव: लागत में कमी और बढ़ता मुनाफा
विशेषज्ञों का मानना है कि इस मशीन के व्यापक इस्तेमाल से कपास की खेती की लागत में 30% से 40% तक की कमी आ सकती है। जब किसान को मज़दूरी पर खर्च कम करना पड़ेगा, तो उसका शुद्ध लाभ बढ़ेगा। इसके अलावा, कपास की तुड़ाई समय पर होने से इसकी चमक और गुणवत्ता (Grade) बेहतर रहेगी, जिससे किसानों को बाज़ार में ऊंचे दाम मिलेंगे।
उपलब्धता और भविष्य की योजनाएं
कृषि मंत्रालय का लक्ष्य है कि इस मशीन को जल्द से जल्द हर राज्य के कृषि केंद्रों और सहकारी समितियों के माध्यम से किसानों तक पहुँचाया जाए। संभावना है कि सरकार इस मशीन पर सब्सिडी (अनुदान) भी प्रदान करे ताकि छोटे किसान भी इसे आसानी से खरीद सकें या किराए पर ले सकें।
कपास हार्वेस्टिंग मशीन केवल एक धातु का ढांचा नहीं है, बल्कि यह किसानों के सम्मान और उनकी खुशहाली का प्रतीक है। भोपाल के वैज्ञानिकों की यह खोज और कृषि मंत्री की संवेदनशीलता ने यह साबित कर दिया है कि जब सरकार और विज्ञान साथ आते हैं, तो बदलाव ज़रूर आता है। अब वह दिन दूर नहीं जब कपास की खेती करने वाला किसान कर्ज में नहीं, बल्कि गर्व के साथ अपना सिर ऊंचा करके जिएगा।




