भारतीय राजनीति में चौधरी चरण सिंह का नाम एक ऐसे हस्ताक्षर के रूप में दर्ज है, जिन्होंने सादगी और शुचिता के मानक स्थापित किए। वे देश के पांचवें प्रधानमंत्री थे, लेकिन सत्ता के शीर्ष पर पहुँचने के बाद भी उनके निजी जीवन में कोई ठाट-बाट नहीं आया। उनकी जयंती के अवसर पर उनके जीवन के वे प्रसंग फिर से जीवंत हो उठते हैं, जो बताते हैं कि सार्वजनिक जीवन में नैतिकता का अर्थ क्या होता है।
सरकारी संसाधन और निजी मर्यादा: 1966 का वह प्रसंग
यह बात उस समय की है जब चौधरी चरण सिंह उत्तर प्रदेश सरकार में वन मंत्री के पद पर आसीन थे। उनके निजी सचिव तिलक राम शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘माइ डेज विद चौधरी चरण सिंह’ में एक ऐसी घटना का वर्णन किया है जो आज के दौर में अकल्पनीय लगती है। चौधरी साहब की सुपुत्री सत्यवती उन दिनों लखनऊ आई हुई थीं। बातचीत के दौरान चौधरी साहब को पता चला कि उनकी बेटी आगरा से लखनऊ आने के लिए वन विभाग की सरकारी जीप का इस्तेमाल करके आई है।
हालांकि सत्यवती ने अपनी ओर से सावधानी बरतते हुए पेट्रोल का खर्च खुद वहन किया था, लेकिन जैसे ही यह बात चौधरी साहब के संज्ञान में आई, वे विचलित हो गए। उन्होंने तुरंत अपने सचिव को बुलाया और आदेश दिया कि इस यात्रा का जो भी सरकारी किराया (Rental) बनता है, उसका हिसाब तुरंत लगाया जाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकारी गाड़ी का निजी उपयोग किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और उस यात्रा का पूरा भुगतान उन्होंने अपनी निजी जेब से किया। उन्होंने सख्त हिदायत दी थी कि यह सरकारी भरपाई उसी दिन दोपहर तक हो जानी चाहिए। यह घटना दर्शाती है कि वे सरकारी संपत्ति और निजी रिश्तों के बीच कितनी स्पष्ट लक्ष्मण रेखा खींचकर चलते थे।
ईमानदारी की कीमत: जब घर में थी तंगी और फटी धोती
चौधरी चरण सिंह की इस कठोर ईमानदारी का सीधा असर उनके घर की आर्थिक स्थिति पर पड़ता था। उनकी पत्नी, गायत्री देवी को घर चलाने के लिए अक्सर कड़ा संघर्ष करना पड़ता था। इसका कारण यह था कि चौधरी साहब अपने पद का कोई भी अनुचित लाभ नहीं लेते थे। यहाँ तक कि राजनीतिक या निजी उद्देश्यों के लिए किए जाने वाले फोन कॉल्स (Trunk Calls) का बिल भी वे अपनी जेब से भरते थे। सरकारी दौरों के बजाय यदि वे किसी निजी कार्यक्रम में जाते, तो वाहन का खर्च भी घर के बजट से ही जाता था।
इन्हीं कटौतियों का परिणाम था कि गायत्री देवी अपने लिए नए कपड़े तक नहीं खरीद पाती थीं। एक बार का किस्सा मशहूर है कि चौधरी साहब जब स्नान के बाद बाहर निकले, तो उनके सामने फटी हुई धोती रखी गई। तंगहाली और सादगी का यह आलम देखकर उन्होंने अपनी पत्नी से व्यंग्य में पूछा, “क्या आज मैं इसी फटी धोती को पहनकर कैबिनेट की बैठक में जाऊं?” उस दिन उन्होंने उस धोती के दो टुकड़े कर दिए ताकि वह दोबारा पहनने लायक ही न रहे। यह केवल एक गुस्सा नहीं था, बल्कि एक ईमानदार व्यक्ति की बेबसी और उसके सिद्धांतों के बीच का टकराव था।
काम के प्रति समर्पण: 12 घंटे का अनवरत रूटीन
चौधरी चरण सिंह केवल ईमानदार ही नहीं, बल्कि बेहद परिश्रमी भी थे। उनका कार्य अनुशासन किसी भी युवा के लिए प्रेरणा बन सकता है। वे सुबह साढ़े नौ बजे काउंसिल हाउस पहुँच जाते थे और रात के साढ़े नौ बजे तक लगातार काम करते रहते थे। गर्मियों के दिनों में भी उनके इस रूटीन में कोई बदलाव नहीं आता था। दिनभर के काम के दौरान वे लंच ब्रेक नहीं लेते थे। वे सुबह हल्का नाश्ता करके घर से निकलते और सीधे रात को ही भोजन करते थे। दोपहर के समय वे केवल चाय-बिस्किट या कभी-कभार तरबूज खाकर अपना काम जारी रखते थे। उनका मानना था कि जनता के काम में एक मिनट की देरी भी उनके साथ अन्याय है।
अमिट विरासत
आज जब हम किसान दिवस मनाते हैं, तो हमें याद रखना चाहिए कि चौधरी चरण सिंह केवल इसलिए बड़े नहीं थे कि वे प्रधानमंत्री बने, बल्कि इसलिए महान थे क्योंकि उन्होंने सत्ता में रहते हुए भी अपनी जड़ों को नहीं छोड़ा। वे किसानों की समस्याओं को केवल फाइलों में नहीं, बल्कि अपने दिल में महसूस करते थे। उनके जीवन के ये छोटे–छोटे प्रसंग हमें सिखाते हैं कि सार्वजनिक पद एक जिम्मेदारी है, विलासिता नहीं। उनकी सादगी, ईमानदारी और काम के प्रति समर्पण ही वह असली खाद है, जिसने भारतीय लोकतंत्र की जमीन को उपजाऊ बनाया है। उनके विचार और आदर्श आज भी हर उस व्यक्ति के लिए मार्गदर्शक हैं जो देश की सेवा का संकल्प लेता है।





