मध्य प्रदेश का विंध्य क्षेत्र अब केवल अपनी ऐतिहासिक विरासत के लिए ही नहीं, बल्कि कृषि क्षेत्र में एक बड़े बदलाव के लिए भी जाना जाएगा। बुधवार को केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने रीवा प्रवास के दौरान ‘बसामन मामा गोधाम’ का अवलोकन किया। उन्होंने यहाँ चल रहे गौ-संरक्षण और प्राकृतिक खेती के अनूठे मेल को न केवल सराहा, बल्कि इसे पूरे देश के लिए एक प्रेरणादायक मॉडल (National Model) करार दिया। अमित शाह का यह दौरा ऐसे समय में हुआ है जब देश के कृषि क्षेत्र को रसायनों के घातक प्रभाव से बचाने की सख्त जरूरत महसूस की जा रही है।
अटल जी को याद कर शुरू किया मिशन
अपने संबोधन की शुरुआत में गृह मंत्री ने पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी को उनकी जयंती (सुशासन दिवस) पर नमन किया। उन्होंने कहा कि अटल जी का रीवा और बघेली संस्कृति से गहरा लगाव था। उनके सिद्धांतों पर चलते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार अब ‘प्रकृति आधारित विकास’ पर जोर दे रही है। अमित शाह ने कहा कि जिस तरह रीवा ने एशिया के सबसे बड़े सोलर प्लांट से ऊर्जा के क्षेत्र में पहचान बनाई, अब यह गोधाम प्राकृतिक खेती के जरिए देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा देगा।
केमिकल बनाम प्रकृति: जीवन बचाने का संकल्प
अमित शाह ने मंच से किसानों और समाज को आगाह किया कि रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अंधाधुंध उपयोग मानव स्वास्थ्य के लिए अभिशाप बन रहा है। उन्होंने सीधे शब्दों में कहा कि आज बढ़ते हुए कैंसर, ब्लड प्रेशर और शुगर जैसी बीमारियों के पीछे जहरीली खेती का बड़ा हाथ है।
उन्होंने वैज्ञानिकों और अपने निजी अनुभवों का हवाला देते हुए बताया कि एक अकेली देशी गाय के गोबर और गोमूत्र की सहायता से 21 एकड़ भूमि पर प्राकृतिक खेती की जा सकती है। यह तकनीक न केवल खेती की लागत को शून्य के बराबर ले आती है, बल्कि मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को भी पुनः जीवित करती है। शाह ने बताया कि उन्होंने स्वयं अपने खेतों में इसका प्रयोग किया है और आज देशभर में 40 लाख से अधिक किसान इस जैविक मार्ग को अपना चुके हैं।
बसामन मामा गोधाम: केवल गौशाला नहीं, एक उद्योग केंद्र
रीवा के बसामन मामा गोधाम की तारीफ करते हुए गृह मंत्री ने कहा कि यहाँ का प्रबंधन सराहनीय है। 52 एकड़ में फैले इस गौ-अभ्यारण्य में 9000 से अधिक बेसहारा गायों की देखभाल हो रही है। लेकिन यह केवल एक आश्रय स्थल नहीं है; यहाँ गोबर और गोमूत्र से ‘गो-काष्ठ’, जैविक खाद और ‘गोनाइल’ जैसे उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं।
कलेक्टर प्रतिभा पाल ने गृह मंत्री को जानकारी दी कि इस गोधाम की सफलता से प्रेरित होकर आसपास के 50 गांवों के लगभग 5000 किसानों ने रासायनिक खेती को हमेशा के लिए त्याग दिया है। यह इस बात का प्रमाण है कि यदि सरकार और समाज मिलकर प्रयास करें, तो बेसहारा मवेशियों की समस्या को ग्रामीण अर्थव्यवस्था की ताकत में बदला जा सकता है।
सहकारिता से समृद्धि: सर्टिफिकेशन और एक्सपोर्ट
किसानों की बड़ी समस्या उनके जैविक उत्पादों के सही दाम और शुद्धता के प्रमाणन (Certification) की होती है। इस पर अमित शाह ने महत्वपूर्ण घोषणा की। उन्होंने बताया कि मोदी सरकार ने सहकारिता मंत्रालय के माध्यम से दो बड़ी संस्थाएं बनाई हैं। ये संस्थाएं प्राकृतिक खेती की उपज का विश्वस्तरीय लैब में परीक्षण करेंगी, उसकी बेहतर पैकेजिंग करेंगी और उसे वैश्विक बाजारों में निर्यात (Export) करने में मदद करेंगी।
आने वाले समय में देशभर में 400 से अधिक ऐसी लैब स्थापित की जाएंगी जो किसानों की फसल को सर्टिफाइड करेंगी। इससे न केवल किसानों का मुनाफा बढ़ेगा, बल्कि ‘विकसित भारत’ का सपना भी साकार होगा।
पर्यावरण का ‘पीपल’ संदेश
भाषण के दौरान अमित शाह ने एक भावुक अपील भी की। उन्होंने कहा कि आने वाले मानसून में हर गांव के लोग कम से कम 5 पीपल के पेड़ जरूर लगाएं। उन्होंने गीता का संदर्भ देते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने खुद को वृक्षों में ‘पीपल’ बताया है। चूँकि पीपल सबसे अधिक ऑक्सीजन देता है, इसलिए यह पर्यावरण और जन-स्वास्थ्य दोनों के लिए पुण्य का कार्य है।
अमित शाह का रीवा दौरा केवल एक राजनीतिक दौरा नहीं था, बल्कि यह देश की कृषि नीति में आने वाले बड़े बदलाव का संकेत था। ‘बसामन मामा गोधाम‘ का मॉडल यह साबित करता है कि गौ–संरक्षण और आधुनिक खेती एक–दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। गृह मंत्री के ‘केमिकल छोड़ो‘ संदेश ने विंध्य के किसानों में एक नई ऊर्जा का संचार किया है। अब देखना यह है कि यह ‘रीवा मॉडल‘ देश के अन्य राज्यों के लिए कितनी जल्दी प्रेरणा का आधार बनता है।





