उत्तर प्रदेश का कन्नौज जिला, जिसे दुनिया ‘इत्र की नगरी’ के नाम से जानती है, आज एक और बड़ी वजह से चर्चा में है। यहाँ की ग्रामीण महिलाओं ने इत्र बनाने की पारंपरिक कला को अपना पेशा बनाकर आत्मनिर्भरता की नई मिसाल पेश की है। प्रदेश सरकार के ‘उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन’ के सहयोग से इन महिलाओं ने वह मुकाम हासिल किया है, जहाँ उनकी बनाई सुगंध न केवल देश के महानगरों बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों की भी शोभा बढ़ा रही है।
स्वयं सहायता समूहों ने बदली ग्रामीण तस्वीर
कन्नौज की हजारों महिलाएं आज अलग-अलग स्वयं सहायता समूहों (SHG) से जुड़कर काम कर रही हैं। मिशन के तहत इन महिलाओं को न केवल आर्थिक मदद दी गई, बल्कि इत्र बनाने की बारीकियों, फूलों की उन्नत खेती और मार्केटिंग का विशेष प्रशिक्षण भी दिया गया। इस सरकारी पहल का नतीजा यह है कि जो महिलाएं पहले केवल खेतों में मजदूरी करती थीं, वे आज खुद का व्यापार चला रही हैं।
तरावती की सफलता: एक प्रेरणादायक यात्रा
इस मुहिम से जुड़ी स्वयं सहायता समूह की सदस्य तरावती की कहानी बेहद खास है। उन्होंने बताया कि सरकारी सहायता और मिशन के मार्गदर्शन की बदौलत उन्होंने इत्र निर्माण का एक छोटा कारखाना स्थापित किया है। तरावती के समूह द्वारा तैयार किए गए गुलाब जल और इत्र आज सरस मेलों और इंटरनेशनल ट्रेड शो का मुख्य आकर्षण बन चुके हैं। उनके उत्पाद अब विदेशों तक निर्यात किए जा रहे हैं, जो उनकी मेहनत और उत्पादों की गुणवत्ता का सबसे बड़ा प्रमाण है।
कमाई का गणित और बढ़ती डिमांड
इत्र का यह व्यवसाय महिलाओं के लिए एक ठोस आर्थिक आधार बन चुका है। सामान्य दिनों में स्वयं सहायता समूह के उत्पाद थोक और आकर्षक पैकिंग के माध्यम से बाजार में बेचे जाते हैं, जिससे प्रति सदस्य औसतन 30 से 50 हजार रुपये की आय हो रही है। मेलों और त्यौहारों के सीजन में यह मांग इतनी बढ़ जाती है कि महिलाओं की आय 40 हजार रुपये से भी ऊपर निकल जाती है।
प्रशासनिक सहयोग और भविष्य की योजनाएं
मुख्य विकास अधिकारी राम कृपाल चौधरी के अनुसार, कन्नौज की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाएं अब महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। आजीविका मिशन से जुड़कर महिलाएं अब कच्चे माल के उत्पादन से लेकर फाइनल प्रोडक्ट की पैकेजिंग और ब्रांडिंग तक का काम खुद कर रही हैं। प्रशासन का लक्ष्य है कि आने वाले समय में जिले के हर ब्लॉक में महिलाओं के लिए ऐसे विशेष क्लस्टर बनाए जाएं, जो कन्नौज के इत्र को वैश्विक ब्रांड के रूप में और मजबूती दे सकें।
कन्नौज की इन महिलाओं की कहानी यह साबित करती है कि यदि पारंपरिक हुनर को सरकारी सहयोग और सही बाजार मिल जाए, तो ग्रामीण भारत की तस्वीर बदल सकती है। इत्र की यह खुशबू अब केवल बोतलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन हजारों महिलाओं के आत्मविश्वास और स्वावलंबन की महक बन चुकी है, जिन्होंने अपनी तकदीर खुद लिखने का फैसला किया है।





