भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) द्वारा आयोजित एक भव्य समारोह में भारतीय पशुधन की ताकत और उसकी विविधता का उत्सव मनाया गया। इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने एक बहुत ही मार्मिक और वैज्ञानिक बात कही। उन्होंने स्पष्ट किया कि पशुओं के साथ भारत का नाता केवल दूध या पैसों का नहीं है, बल्कि यह धरती के पारिस्थितिकी तंत्र (Ecology) को बचाने का एक पवित्र रिश्ता है।
देसी नस्लें: ग्रामीण अर्थव्यवस्था की असली ताकत
कृषि मंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि “देसी गाय, भैंस, मुर्गियां और छोटे पशु हमारी कृषि आधारित अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं।” उन्होंने जोर देकर कहा कि अगर किसानों की आय बढ़ानी है और खेती को सुरक्षित बनाना है, तो हमें अपनी उन नस्लों की ओर वापस लौटना होगा जो सदियों से हमारे वातावरण के अनुकूल रही हैं। चौहान ने वैज्ञानिकों और किसानों की सराहना करते हुए कहा कि देसी नस्लों को बचाना केवल जैव विविधता की रक्षा नहीं है, बल्कि यह गांवों की रोजी-रोटी और टिकाऊ खेती के भविष्य की गारंटी है।
नीतियों से निकलकर गांवों तक पहुँचे मिशन
शिवराज सिंह चौहान ने इस बात पर चिंता जताई कि कई बेहतरीन योजनाएं केवल फाइलों और कॉन्फ्रेंस हॉल तक सीमित रह जाती हैं। उन्होंने आह्वान किया कि नस्ल संरक्षण के इस मिशन को एक ‘जन आंदोलन’ बनना चाहिए। इसे हर खेत, हर खलिहान और हर किसान परिवार तक पहुँचना होगा। उन्होंने मीडिया से भी अपील की कि वे उन किसानों और वैज्ञानिकों की कहानियों को प्रमुखता से दिखाएं जो लुप्त होती नस्लों को बचाने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे हैं।

लक्ष्य 2047: हर देसी पशु की होगी अपनी पहचान
कार्यक्रम के दौरान राज्य मंत्री डॉ. जाट ने ‘विकसित भारत @2047’ का विजन साझा किया। उन्होंने बताया कि साल 2008 से अब तक भारत ने 242 स्वदेशी नस्लों का सफलतापूर्वक पंजीकरण कर लिया है। ICAR का लक्ष्य है कि आने वाले समय में देश के 100% देसी पशुओं का रजिस्ट्रेशन पूरा किया जाए। इस मिशन को ‘ज़ीरो नॉन-डिस्क्रिप्ट एनिमल्स’ (Zero Non-Descript Animals) नाम दिया गया है, जिसका अर्थ है कि भविष्य में कोई भी पशु बिना पहचान के नहीं रहेगा। इससे न केवल बायोपायरेसी (तकनीक की चोरी) से बचाव होगा, बल्कि किसानों को उनके ‘बौद्धिक संपदा अधिकारों’ (IPR) का लाभ भी मिलेगा।
सम्मान: जिन्होंने बचाई देश की विरासत
इस समारोह में उन नायकों को सम्मानित किया गया जिन्होंने अपनी मेहनत से दुर्लभ नस्लों को नया जीवन दिया। नस्ल संरक्षण पुरस्कार 2025 की मुख्य झलकियाँ:
- व्यक्तिगत श्रेणी: असम के श्री जीतुल बुरागोहेन को ‘लुइट भैंस’ के संरक्षण के लिए प्रथम पुरस्कार मिला। आंध्र प्रदेश के श्री कुडाला राम दास को दुर्लभ ‘पुंगनूर मवेशियों’ को बचाने के लिए द्वितीय पुरस्कार से नवाजा गया।
- संस्थागत श्रेणी: ‘बिनझारपुरी मवेशी प्रमोटर्स सोसाइटी’ (ओडिशा) को प्रथम और ‘तमिलनाडु पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय’ को पुलिक्कुलम मवेशियों के संरक्षण के लिए सम्मानित किया गया।
क्यों ज़रूरी है पंजीकरण?
पशु नस्ल पंजीकरण कार्यक्रम की शुरुआत 2008 में हुई थी। यह सिर्फ एक सर्टिफिकेट नहीं है, बल्कि एक कानूनी सुरक्षा है। यह सुनिश्चित करता है कि हमारी देसी नस्लों पर भारत का संप्रभु अधिकार बना रहे। इससे नस्ल-विशिष्ट नीतियां बनाने में मदद मिलती है, जिससे किसानों को सीधा आर्थिक लाभ होता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन को आगे बढ़ाते हुए यह कार्यक्रम साबित करता है कि भारत अब अपने ‘जेनेटिक रिसोर्स’ की पहचान और बचाव के प्रति गंभीर है। देसी पशुधन न केवल पोषण सुरक्षा (Nutrition Security) प्रदान करता है, बल्कि यह जलवायु परिवर्तन के दौर में खेती का सबसे मजबूत बीमा भी है।




