अक्सर कहा जाता है कि खेती और पशुपालन अब घाटे का सौदा बन चुके हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के पहासू कस्बे के एक युवा और प्रगतिशील किसान पराग गौड़ ने इस धारणा को न केवल चुनौती दी है, बल्कि उसे गलत साबित कर दिया है। ‘प्रकृति नूतन वन गौसदन’ चलाने वाले पराग के चेहरे पर आज जो मुस्कान है, उसके पीछे कड़ी मेहनत और आधुनिक विज्ञान का हाथ है। उनकी गौशाला में एक देसी गाय ने जुड़वा बछियों को जन्म दिया है, जो सामान्य रूप से बहुत दुर्लभ माना जाता है। लेकिन यह कोई चमत्कार नहीं, बल्कि ‘एम्ब्रियो ट्रांसफर टेक्नोलॉजी’ (ETT) की ताकत है।
समस्या से समाधान तक का सफर
आज के समय में डेयरी किसानों के सामने दो सबसे बड़ी चुनौतियां हैं—पहला, देसी गायों का कम दूध देना और दूसरा, बछड़ों (नर) की बढ़ती संख्या, जिनका उपयोग खेती में कम हो गया है। पराग गौड़ ने इन समस्याओं के आगे घुटने टेकने के बजाय समाधान खोजा। उन्होंने अपनी गौशाला में ‘बैल कोल्हू’ स्थापित किया ताकि बछड़ों को रोजगार से जोड़ा जा सके, और दूध बढ़ाने के लिए उन्होंने राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) का दरवाजा खटखटाया।
ETT तकनीक: क्या है यह ‘गेम चेंजर’ विज्ञान?
पराग बताते हैं कि उन्होंने NDDB के वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में ETT (Embryo Transfer Technology) कार्यक्रम के साथ अनुबंध किया। सरल भाषा में कहें तो, इस तकनीक में एक श्रेष्ठ नस्ल की ‘दाता’ गाय से भ्रूण लिया जाता है और उसे दूसरी सामान्य गाय के गर्भाशय में स्थापित किया जाता है।
इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि:
- श्रेष्ठ नस्ल: आप एक साल में एक गाय से कई उत्तम नस्ल की बछियाँ प्राप्त कर सकते हैं।
- उत्पादन में वृद्धि: अच्छी नस्ल की गायों से दूध का उत्पादन 2-3 गुना तक बढ़ जाता है।
- समय की बचत: नस्ल सुधार में जो काम पीढ़ियों में होता था, वह अब चंद महीनों में संभव है।
कैसे बनें ‘लखपति’ किसान?
पराग की सफलता की कहानी सिर्फ दूध बेचने तक सीमित नहीं है। आज उनकी गौशाला ‘नस्ल सुधार’ का एक केंद्र बन चुकी है। जब आपके पास गिर, साहीवाल या थारपारकर जैसी उच्च गुणवत्ता वाली बछियाँ होती हैं, तो उनकी बाजार में कीमत लाखों में होती है। एक सामान्य गाय जहाँ 5-10 लीटर दूध देती है, वहीं ETT से तैयार श्रेष्ठ नस्ल की गाय 20-30 लीटर तक दूध दे सकती है। यह तकनीक छोटे किसानों के लिए एक ‘मनी मेकिंग मशीन’ साबित हो रही है।
NDDB का साथ और भविष्य की राह
राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) आज पराग जैसे हजारों किसानों के साथ मिलकर ‘नस्ल गुणन फार्म’ (BMF) स्थापित करने में मदद कर रहा है। सरकार का उद्देश्य इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) और एम्ब्रियो ट्रांसफर जैसी तकनीकों को गांव-गांव तक पहुँचाना है। इससे न केवल हमारी देसी नस्लों का संरक्षण होगा, बल्कि किसान आर्थिक रूप से इतने मजबूत हो जाएंगे कि उन्हें शहर जाकर नौकरी करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
जोखिम ही सफलता की सीढ़ी है
पराग गौड़ कहते हैं, “शुरुआत में डर था कि तकनीक सफल होगी या नहीं, लेकिन आज जब मैं इन जुड़वा बछियों को देखता हूँ, तो उत्साह दोगुना हो जाता है।” उनकी यह सफलता उन सभी युवाओं के लिए एक मिसाल है जो स्टार्टअप के नाम पर खेती-किसानी से दूर भागते हैं। यदि सही तकनीक और अटूट संकल्प हो, तो देसी गाय पालन आपको समाज में सम्मान और बैंक बैलेंस, दोनों दिला सकता है।
यदि आप भी डेयरी बिजनेस में उतरना चाहते हैं या अपनी पुरानी गौशाला को मुनाफे में बदलना चाहते हैं, तो पारंपरिक सोच से बाहर निकलना होगा। ETT जैसी तकनीकें आज के किसान को ‘बिजनेस लीडर’ बनाने की क्षमता रखती हैं। पराग गौड़ की यह कहानी इस बात का प्रमाण है कि विज्ञान जब परंपरा से मिलता है, तो समृद्धि के नए द्वार खुलते हैं।





