अक्सर ‘बासमती’ शब्द सुनते ही हमारे जेहन में लंबे चावल और उसकी मनमोहक खुशबू की तस्वीर उभरती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यही खुशबू आपको तोरई (Sponge Gourd) की सब्जी में भी मिल सकती है? भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान (IIVR), वाराणसी के कृषि वैज्ञानिकों ने 8 वर्षों की लंबी और कठिन मेहनत के बाद तोरई की एक ऐसी प्राकृतिक प्रजाति विकसित की है, जो पकने पर बासमती चावल जैसी महक छोड़ती है। यह नवाचार न केवल उपभोक्ताओं के लिए नया अनुभव होगा, बल्कि किसानों के लिए भी मुनाफे की नई राह खोलेगा।
पहचान और पंजीकरण: क्या है इस किस्म का नाम?
इस विशेष प्रजाति को विकसित करने का श्रेय संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. त्रिभुवन चौबे और उनकी टीम को जाता है। उन्होंने बताया कि इस अनूठी किस्म को ‘वीआरएसजी 7-17’ (VRSG 7-17) नाम दिया गया है। इसकी महत्ता को देखते हुए, इसे नेशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज (NBPGR), नई दिल्ली में विधिवत पंजीकृत भी कर लिया गया है। यह किस्म पूरी तरह से प्राकृतिक है और इसके बीज जल्द ही आम किसानों के लिए बाजार में उपलब्ध होंगे।
तोरई की शारीरिक विशेषताएं और रंग-रूप
IIVR के निदेशक डॉ. राजेश कुमार के अनुसार, इस तोरई का रंग हल्का हरा (Light Green) है। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, बस्ती मंडल और बिहार के कई हिस्सों में इस रंग की तोरई को सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है। इसकी शारीरिक बनावट की बात करें तो:
- लंबाई: औसतन 27.46 सेंटीमीटर।
- वजन: प्रति फल लगभग 156.5 ग्राम।
- आकार: फल का व्यास (डायमीटर) करीब 3.35 सेंटीमीटर होता है।
- उत्पादन: एक अकेला पौधा औसत 1.13 किलो फल देने की क्षमता रखता है।
किचन में भी बनी रहेगी महक
इस तोरई की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसकी खुशबू सिर्फ खेत तक सीमित नहीं रहती। जब गृहणियां इसे रसोई में उबालेंगी या पकाएंगी, तो बासमती की सोंधी महक पूरे घर में फैल जाएगी। सब्जी बनने के बाद भी यह सुगंध बरकरार रहती है, जो भोजन के स्वाद को कई गुना बढ़ा देती है।
फसल चक्र: 60 दिनों में तैयार होगी पैदावार
किसानों के लिए यह एक ‘कैश क्रॉप’ की तरह है क्योंकि इसकी फसल बहुत कम समय में तैयार हो जाती है। बुवाई के मात्र 50 से 60 दिनों के भीतर इसमें फल आने शुरू हो जाते हैं। बहुत से प्रगतिशील किसानों ने पहले ही संस्थान से इन बीजों के लिए संपर्क करना शुरू कर दिया है।
खेती के लिए विशेषज्ञों के सुझाव: कैसे पाएं बेहतर उपज?
यदि आप इस नई किस्म की खेती करना चाहते हैं, तो वैज्ञानिकों ने कुछ विशेष तरीके सुझाए हैं:
- मचान विधि (Trellis System): तोरई की लताओं को मचान पर चढ़ाने से फल जमीन के संपर्क में नहीं आते, जिससे उनमें कीट नहीं लगते और उनका रंग-रूप आकर्षक बना रहता है।
- मिट्टी का चयन: अच्छी जल निकासी वाली दोमट मिट्टी इसके लिए सर्वोत्तम है। 3-4 बार गहरी जुताई के बाद गोबर की खाद या वर्मीकम्पोस्ट का प्रयोग करें।
- बेड प्लांटिंग: 5-7 फीट की दूरी पर बेड बनाकर बुवाई करें। बेड की ऊंचाई 1-1.5 फीट रखें ताकि बरसात के मौसम में पानी का ठहराव न हो।
- सीजन: इसे खरीफ (बरसात) और रबी (सर्दियों के अंत) दोनों मौसमों में उगाया जा सकता है।
तोरई की यह नई बासमती सुगंध वाली किस्म कृषि विविधीकरण (Diversification) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। बाजार में जब यह ‘ब्रांडेड’ सब्जी के रूप में पहुंचेगी, तो निश्चित रूप से किसानों को सामान्य तोरई के मुकाबले इसका बेहतर प्रीमियम दाम मिलेगा। यह रिसर्च ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘विकसित कृषि’ की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर है।





