देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) पर एक विशेष वीडियो साझा कर, देशवासियों का ध्यान भारत की समृद्ध संस्कृति और विरासत की ओर आकर्षित किया है। पीएम मोदी ने ‘सुप्रभातम् कार्यक्रम’ के एक विशेष खंड – ‘संस्कृत सुभाषित’ – की सराहना करते हुए कहा कि इसके माध्यम से भारतीय संस्कृति और विरासत को लेकर एक नई चेतना का संचार होता है।
प्रधानमंत्री का यह कदम दर्शाता है कि सरकार केवल आर्थिक और रणनीतिक मुद्दों पर ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण (Cultural Renaissance) को भी प्राथमिकता दे रही है, और इसके लिए आधुनिक तकनीक (सोशल मीडिया) का प्रभावी ढंग से उपयोग कर रही है।
1. PM मोदी ने क्यों चुना संस्कृत सुभाषित?
पीएम मोदी ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा: “सुप्रभातम् कार्यक्रम में एक विशेष हिस्से की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा। यह है संस्कृत सुभाषित। इसके माध्यम से भारतीय संस्कृति और विरासत को लेकर एक नई चेतना का संचार होता है। यह है आज का सुभाषित…”
यह टिप्पणी महज एक शेयर नहीं, बल्कि सदियों पुराने संस्कृत ज्ञान को आधुनिक जीवन से जोड़ने का एक प्रयास है।
- विरासत से जुड़ाव: ‘सुभाषित’ संस्कृत के वे छोटे, सरल श्लोक या सूक्तियाँ होती हैं जो जीवन, नैतिकता, ज्ञान, और व्यवहार से संबंधित गहरे सत्य को संक्षेप में प्रस्तुत करती हैं। पीएम मोदी का मानना है कि ये सूत्र युवा पीढ़ी को उनकी जड़ों से जोड़ने का सबसे प्रभावी माध्यम हैं।
- नई चेतना: आज की भाग-दौड़ भरी ज़िंदगी में जब लोग तनाव और अनिश्चितता का सामना कर रहे हैं, तब ये सुभाषित नैतिक मार्गदर्शन और सकारात्मक ऊर्जा देने का काम करते हैं। यही ‘नई चेतना’ है जिसकी बात प्रधानमंत्री ने की है।
2. ‘सुप्रभातम् कार्यक्रम’ और ज्ञान का प्रसार
जिस ‘सुप्रभातम् कार्यक्रम’ का उल्लेख प्रधानमंत्री ने किया है, वह संभवतः किसी चैनल या रेडियो का दैनिक शो है जो दिन की शुरुआत सकारात्मकता के साथ करने का संदेश देता है। ‘संस्कृत सुभाषित’ खंड इस कार्यक्रम का एक ऐसा हिस्सा है जो रोज एक नया नैतिक विचार प्रस्तुत करता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने इस खंड को सोशल मीडिया पर लाकर इसकी पहुँच को करोड़ों गुना बढ़ा दिया है। यह दिखाता है कि कैसे सोशल मीडिया को राजनीतिक संवाद के अलावा सांस्कृतिक शिक्षा और जागरूकता के मंच के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
3. संस्कृत: ज्ञान की भाषा से जन-जन की भाषा तक
पीएम मोदी लंबे समय से भारत की शास्त्रीय और प्राचीन भाषाओं, विशेषकर संस्कृत को बढ़ावा देने के पक्षधर रहे हैं।
- पुनरुद्धार का प्रयास: सुभाषित को सोशल मीडिया पर प्रचारित करना संस्कृत को केवल ‘पुरोहितों की भाषा’ या ‘अकादमिक भाषा’ की छवि से बाहर निकालकर, उसे ‘जन-जन की भाषा’ बनाने के व्यापक प्रयास का हिस्सा है।
- सरल माध्यम: सुभाषित (जैसे ‘विद्या ददाति विनयम’ या ‘उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः’) इतने सरल होते हैं कि इनका अर्थ समझना आसान होता है, और यही सरलता इसे आम लोगों के बीच लोकप्रिय बना सकती है।
4. युवा पीढ़ी पर प्रभाव: नैतिक शिक्षा का समावेश
आज की युवा पीढ़ी, जो तेज़ी से वेस्टर्न कल्चर और सोशल मीडिया ट्रेंड्स से प्रभावित है, उसके लिए ऐसे सुभाषित नैतिक शिक्षा का काम करते हैं।
- जीवन मूल्य: ये सुभाषित, जो मूलतः हजारों साल पुराने हैं, आज भी ईमानदारी, कड़ी मेहनत, विनम्रता और ज्ञान के महत्व जैसे सार्वभौमिक जीवन मूल्यों को सिखाते हैं।
- आधुनिक प्लेटफॉर्म पर प्राचीन ज्ञान: सोशल मीडिया पर एक छोटा, आकर्षक वीडियो क्लिप युवाओं को आसानी से आकर्षित करता है। इस तरह, प्राचीन भारतीय ज्ञान को एक आधुनिक पैकेजिंग में पेश किया जा रहा है।
5. विरासत संरक्षण और सांस्कृतिक कूटनीति
प्रधानमंत्री का यह कदम भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ (Soft Power) कूटनीति का भी हिस्सा है।
- वैश्विक पहचान: संस्कृत सुभाषित, योग और आयुर्वेद की तरह, भारत की वह अद्वितीय विरासत है जिसकी वैश्विक स्तर पर पहचान है। पीएम मोदी इन तत्वों को बढ़ावा देकर वैश्विक मंच पर भारत की सांस्कृतिक साख को मजबूत करते हैं।
- एकता का संदेश: अलग-अलग भाषाओं और क्षेत्रों वाले देश में, संस्कृत ज्ञान और सुभाषित एक ऐसा सांस्कृतिक धागा प्रदान करते हैं जो पूरे देश को उसकी साझा विरासत के माध्यम से एकता के सूत्र में बांधता है।
निष्कर्ष
पीएम नरेंद्र मोदी द्वारा ‘X’ पर ‘संस्कृत सुभाषित’ को साझा करना केवल एक पोस्ट नहीं है, बल्कि यह डिजिटल युग में भारतीय संस्कृति के पुनर्जागरण की एक स्पष्ट घोषणा है। यह पहल न केवल देशवासियों को उनकी जड़ों से जोड़ती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान और नैतिक मूल्यों की एक अमूल्य विरासत भी सुनिश्चित करती है।





