भारत की सदियों पुरानी गौ-संस्कृति और ग्रामीण आत्मनिर्भरता के संदेश को लेकर राष्ट्रव्यापी ‘गौ राष्ट्र यात्रा’ आज राजस्थान के जैसलमेर जिले के उन सुदूर और चुनौतीपूर्ण सीमावर्ती गाँवों तक पहुँची, जहाँ अक्सर पहुंचना भी मुश्किल होता है। जीव-जंतु कल्याण एवं कृषि शोध संस्थान (AWARI) के अध्यक्ष श्री भारत सिंह राजपुरोहित के नेतृत्व में यह यात्रा सतो, मियाज़लर और ख्याला मठ जैसे गाँवों में पहुँची, जहाँ स्थानीय समुदायों और गौभक्तों ने टीम का गर्मजोशी और पारंपरिक उत्साह के साथ भव्य स्वागत किया। यह यात्रा का एक ऐसा पड़ाव था, जिसने गौ-संरक्षण के प्रति क्षेत्रीय समर्पण की अद्भुत मिसाल पेश की।
रेगिस्तान में देसी गायों की धड़कन: थारपारकर नस्ल का अद्वितीय संरक्षण
इस यात्रा का सबसे हृदयस्पर्शी और महत्वपूर्ण पहलू इन सीमावर्ती गाँवों में देसी नस्ल की थारपारकर गायों का अनूठा और जीवंत संरक्षण रहा। थारपारकर गायें अपनी विशिष्ट विशेषताओं के लिए जानी जाती हैं – ये न केवल शुष्क और गर्म रेगिस्तानी परिस्थितियों में भी आसानी से ढल जाती हैं, बल्कि कम संसाधनों में भी बेहतर दूध उत्पादन करती हैं। श्री भारत सिंह राजपुरोहित ने इन गाँवों में इस नस्ल की सतत मौजूदगी और इसके संरक्षण के लिए किए जा रहे प्रयासों की मुक्त कंठ से प्रशंसा की।
उन्होंने कहा, “देश के इतने सुदूर और भौगोलिक रूप से दुर्गम क्षेत्रों में भी हमारी थारपारकर नस्ल की गायों का इतने समर्पण से संरक्षण किया जा रहा है, यह देखना अत्यंत प्रेरणादायक है। यह इन गौ प्रेमियों के अदम्य साहस और प्रतिबद्धता का प्रमाण है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी हमारी गौ-संस्कृति और देश की अमूल्य पशु जैव-विविधता की रक्षा कर रहे हैं।” यात्रा टीम के सदस्य शैल सिंह राठौड़ और ऋषि बांगा भी इस दौरान स्थानीय गौपालकों से मिले। उन्होंने देसी गौवंश के पर्यावरणीय, आर्थिक और सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डाला, और बताया कि कैसे ये गायें जैविक कृषि को बढ़ावा देने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

राष्ट्रीय चेतना का प्रसार: गौ-सेवा से आत्मनिर्भर भारत का संकल्प
‘गौ राष्ट्र यात्रा’ का मुख्य उद्देश्य केवल देसी गायों को बचाना नहीं है, बल्कि गौवंश आधारित जीवनशैली को समाज के हर वर्ग तक पहुँचाना और किसानों को आत्मनिर्भर बनाना है। यह अभियान भारतीय कृषि की पारंपरिक जड़ों को सशक्त करते हुए उसे आधुनिक संदर्भों से जोड़ रहा है। जैसलमेर के सीमावर्ती गाँवों तक यात्रा का पहुँचना इस बात पर विशेष बल देता है कि भारत की गौ-संस्कृति देश के हर कोने में गहराई से निहित है, भले ही वे कितने भी दूरस्थ क्यों न हों।
स्थानीय सरपंच श्री शैतान सिंह रावलोत और श्री गजेंद्र सिंह रावलोत सहित अनेक स्थानीय गौभक्तों ने यात्रा टीम का स्वागत किया, जो इस अभियान के प्रति जन-समर्थन की व्यापकता को दर्शाता है। यह यात्रा साबित करती है कि गौ-संरक्षण सिर्फ़ धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय आंदोलन है। यह भारत के समृद्ध और टिकाऊ भविष्य की नींव रख रहा है, जहाँ “गौ नहीं बचेगी, तो गाँव नहीं बचेगा — और गाँव नहीं बचेगा, तो भारत नहीं बचेगा” का संदेश पूरे देश में गूँज रहा है।





